Tuesday, August 2, 2011

Take on Communal Violence Bill: Jaya to CMs


Take on Communal Violence Bill: Jaya to CMs

Last Updated: 02 Aug 2011 10:51:07 AM IST
CHENNAI:  Continuing her campaign against the proposed Prevention of Communal Violence (Access to Justice and Reparation) Bill, 2011, Chief Minister J Jayalalithaa on Monday wrote to all non-Congress Chief Ministers as well as non-Congress, non-DMK MPs requesting them to raise their voice against it. “I appeal to all right-thinking political parties and MPs to look at the real intentions of the UPA government at the Centre in piloting this fascist Bill and unite in throwing this out at the introduction stage itself,” Jayalalithaa said in a statement here. Reiterating her view on the Bill, Jayalalithaa said, under the garb of preventing communal and targeted violence, the UPA government was attempting to totally bypass the State governments and concentrate all powers in the Central government rendering the States powerless and totally at the mercy of the Centre. She said the Bill was also an attempt to keep the State governments under the constant threat of dismissal.  She recalled her statement issued on July 29 pointing out the real motives behind the “apparently altruistic bill”.

Throw out 'fascist' communal violence Bill: Jaya to non-Cong CMs

PTI | Aug 1, 2011, 06.26PM IST
CHENNAI: Drumming up support to her opposition to the draft Communal Violence Bill, Tamil Nadu chief minister J Jayalalithaa has written to her non-Congress counterparts and MPs urging them to unite in "throwing out the "fascist bill" at the introduction stage itself.        

The Prevention of Communal and Targeted Violence (Access to Justice and Reparations) Bill 2011 proposed provisions that were a "blatant attempt," by the UPA to totally bypass state governments and keep them under "constant threat of dismissal", she said in a statement here on Monday.          

"I have also written to all the non-Congress chief ministers requesting them to oppose this Bill. A copy of my statement (issued last week) has also been sent to all the non-Congress, non-DMK MPs for raising their voice against this fascist Bill," she said.     

"I appeal to all right-thinking political parties and the MPs to look at the real intentions of the UPA government at the Centre in piloting this bill and unite in throwing it out at the introduction stage itself."             

She recalled her statement issued on July 29 pointing out the real motives behind the "apparently altruistic bill".            

In a hard-hitting statement last week, the AIADMK chief had slammed the bill as "fascist" and said it would give sweeping powers to the Centre and keep the states under constant threat of dismissal.     

Under the garb of preventing communal and targeted violence, the bill was yet another "blatant attempt" to totally bypass the state governments, she had said.

Saturday, July 30, 2011

गंभीर आरोप असम से कांग्रेस के पूर्व सांसद एम. के. सुब्बा पर हैं

बाबा रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण से कहीं ज्यादा गंभीर आरोप असम से कांग्रेस के पूर्व सांसद एम. के. सुब्बा पर हैं। कांग्रेसी सांसद सुब्बा की भारतीय नागरिकता पर सवाल उठाते हुए सीबीआई चार्जशीट तक दायर कर चुकी है। इसके बावजूद सिर्फ एफआईआर के बाद बालकृष्ण का पासपोर्ट रद्द कराने पर आमदा सीबीआई ने सुब्बा का पासपोर्ट रद्द कराने की कोई कोशिश नहीं की है। इससे सीबीआई ने साबित कर दिया है कि वह स्वतंत्र जांच एजेंसी नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के इशारे पर काम करने वाला संगठन है। सीबीआई ने अभी तक बालकृष्ण की भारतीय नागरिकता पर उंगली नहीं उठाई है। उनपर केवल पासपोर्ट ऑफिस में जमा की गईं शैक्षिक डिग्रियों के फर्जी होने के प्रमाण हैं। वहीं, सुब्बा के मामले में सीबीआई ने अदालत में चार्जशीट दाखिल कर उनके भारतीय नागरिक नहीं होने का प्रमाण पेश किया है। इसके बावजूद आज तक सीबीआई ने सुब्बा का पासपोर्ट रद्द करने के लिए विदेश मंत्रालय से अनुरोध करने की जरूरत नहीं समझी। सीबीआई की चार्जशीट के बावजूद सुब्बा न सिर्फ अपना बिजनेस आराम से चला रहे हैं, बल्कि एक पूर्व सांसद को मिलने वाले सुविधाओं का लाभ भी ले रहा है। इस मामले में सीबीआई का दोहरापन इस बात से भी साफ हो जाता है कि बालकृष्ण के फर्जी पासपोर्ट में तत्काल कार्रवाई शुरू हो गई लेकिन सुब्बा के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने में एक दशक से भी ज्यादा समय लग गया। लंबे समय तक सुब्बा के मामले में निष्क्रिय रहने पर सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गंभीरता से जांच शुरू करनी पड़ी। बाद में अदालत के निर्देश पर ही उसने चार्जशीट भी दाखिल की।

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*SANJAY*
RANCHI-
JHARKHAND
Cell- 09431162589

घोटालों के निष्कि्रय संरक्षक



संवैधानिक दायित्व के पालन में लापरवाही को प्रधानमंत्री का मूल स्वभाव बता रहे हैं हृदयनारायण दीक्षित
संप्रग सरकार पर भ्रष्टाचार को संस्थागत बनाने के आरोप थे ही, रही-सही कसर पूर्व संचारमंत्री ए राजा ने पूरी कर दी। राजा ने शीर्ष न्यायपीठ के सामने संचार घोटाले के मामले में प्रधानमंत्री को भी शामिल बताया है। गृहमंत्री पी चिदंबरम भी लपेटे में हैं। कांग्रेस ने इसे एक अभियुक्त के बचाव की बयानबाजी बताकर पल्ला झाड़ लिया है। सर्वोच्च न्यायपीठ के सामने प्रधानमंत्री को सहअभियुक्त जैसा प्रस्तुत किया गया है, बावजूद इसके प्रधानमंत्री चुप हैं। आखिरकार राजा के आरोपों पर प्रधानमंत्री का स्पष्टीकरण क्यों नहीं आया? प्रधानमंत्री के मौन का अर्थ स्वीकृति लगाया जा रहा है। ए राजा ने प्रधानमंत्री को साजिश व कर्तव्यपालन में लापरवाही का दोषी ठहराया है। कर्तव्यपालन में लापरवाही मनमोहन सिंह का मूल स्वभाव है। लेकिन प्रधानमंत्री के विरुद्ध साजिश का आरोप संगीन मामला है। केंद्र सरकार सीधे भ्रष्टाचार के लपेटे में है। राजा के वकील ने कोर्ट से गृहमंत्री को भी गवाह बनाने की मांग की है। पी चिदंबरम पहल करें, कोर्ट के सामने जाएं, न्यायिक कार्यवाहियों में उठे प्रश्नों का उत्तर दें। संविधान निर्माताओं ने ही सरकारी जवाबदेही को संसदीय जनतंत्र का मुख्य आदर्श बताया था। प्रधानमंत्री से कोई अपेक्षा करना बेकार है। वह प्रधानमंत्री पद के वास्तविक प्राधिकार से वंचित हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री की तरह कभी कोई काम नहीं किया। राष्ट्रमंडल घोटाले से देश की अंतरराष्ट्रीय बदनामी हुई। भ्रष्टाचार और लूट के महोत्सव उनकी जानकारी में थे, लेकिन वह लाचार होकर टुकुर-टुकुर ताकते रहे। दूरसंचार घोटाले से वह अवगत थे। ए राजा का वक्तव्य पर्याप्त साक्ष्य है। मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति धांधली में वह शामिल थे। उन्होंने गलत काम को रोकने में कभी कोई हस्तक्षेप नहीं किया। कर्तव्यपालन में ऐसी लापरवाही किसी भी जनतांत्रिक देश के प्रमुख ने नहीं की। उन्होंने अपनी तरफ से भी कभी कोई सही काम नहीं किया। वास्तविक सत्ता सोनिया गांधी ने चलाई, जिम्मेदार वह बने। अच्छाई का श्रेय सोनिया, राहुल ले गए और सारे गलत कामों के जिम्मेदार प्रधानमंत्री बने। उन्होंने सक्रिय, जिम्मेदार और जवाबदेह प्रधानमंत्री होने का कोई प्रयास नहीं किया। पूंजीवादी अर्थशास्त्र की विद्वता व्यावहारिक सत्ता संचालन में काम नहीं आती। वह हरेक मोर्चे पर विफल रहे और वीतरागी संन्यासी की तरह पद से हटने की प्रतीक्षा करते रहे। प्रधानमंत्री करें तो क्या करें? कांग्रेस 1947 से ही ऐसी है। पंडित नेहरू बेशक कामकाजी प्रधानमंत्री थे, लेकिन सत्ता में भ्रष्टाचार की शुरुआत उसी समय हुई। 1949 में नेहरू के खास मंत्री कृष्णमेनन पर 216 करोड़ रुपये के जीप घोटाले का आरोप लगा। लोक लेखा समिति ने दोषी पाया। कुछ दिन बाद वह फिर से मंत्री बने। 1957 में मूंदडा कांड हुआ। वित्तमंत्री टीसी कृष्णमाचारी का त्यागपत्र हुआ। बवाल रुका, वह भी फिर से मंत्री हो गए। कांग्रेस की यही परंपरा आगे चली। इंदिरा गांधी के विरुद्ध नागरवाला कांड राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना। इंदिरा गांधी के शासन में ही भ्रष्टाचार को सार्वजनिक स्वीकृति मिली। प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बोफोर्स ने घेरा। उन्हीं के कृपापात्र क्वात्रोचि का साथ वर्तमान केंद्रीय सत्ता ने भी दिया। प्रधानमंत्री नरसिंहा राव भी पीछे नहीं रहे। रिश्वत देकर संसद में वोट, लक्खूभाई पाठक कांड और हर्षद मेहता कांड सहित तमाम घोटालों के जरिए उन्होंने कांग्रेस की परंपरा को बढ़ाया, बखूबी सरकार भी चलाई। कांग्रेसी परंपरा के सभी पूर्व प्रधानमंत्री घपलो-घोटालों के सक्रिय संरक्षक थे। लेकिन मनमोहन सिंह ऐसे सभी मामलों के निष्कि्रय संरक्षक हैं। दरअसल निष्कि्रयता ही उनकी पूंजी है। सोनिया गांधी ने उन्हें निष्कि्रय रहने का ही काम सौंपा है। राजनीतिक सक्रियता उनका काम नहीं। चुनाव उन्हें लड़ना नहीं। चुनाव अभियान में उनका उपयोग नहीं। उनका कहीं कोई जनाधार भी नहीं। कांग्रेसी जीत का श्रेय उन्हें मिलना नहीं। हार की जिम्मेदारी के लिए उनसे अच्छा कोई दूसरा बलि का बकरा नहीं। वह सोनिया, राहुल और उनके सहयोगियों की अच्छी बुरी सक्रियता को निर्बाध चलाते रहने की जिम्मेदारी ही निभाते हैं। बेशक भ्रष्टाचार रोकना प्रधानमंत्री की ही जिम्मेदारी है। आतंकवाद, आंतरिक सुरक्षा, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, किसान उत्पीड़न आदि समस्याओं से निपटना भी उनका ही प्राथमिक संवैधानिक कर्तव्य है। सारा देश उनसे सक्रियता की अपेक्षा करता है, लेकिन वह सिर्फ एक ही परिवार के प्रति निष्ठावान हैं। वह खुश हैं कि वह परिवार उनसे खुश है। उनकी निष्कि्रयता ही उनकी विद्वता और विनम्रता है। संसदीय जनतंत्र का मुख्य गुण है-जवाबदेही। शीर्ष भ्रष्टाचार के लिए प्रधानमंत्री जिम्मेदार हैं, लेकिन उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोप में किसी मंत्री को नहीं हटाया। कोर्ट ने पहल की तभी कार्रवाई हुई। ए राजा ने सीधे उन पर, गृहमंत्री और सोलीसिटर जनरल पर उंगली उठाई है। बावजूद इसके वह चुप हैं। हाईकमान ने उन्हें चुप रहने को ही कहा है। जाहिर है, कांग्रेस और केंद्र सरकार जनता के प्रति जवाबदेही के संवैधानिक सिद्धांत को नहीं मानते। (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं)
source: http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-07-29&pageno=8

Jayalalithaa Opposes Communal Violence Bill, Says, It's Fascist PTI


Jayalalithaa Opposes Communal Violence Bill, Says, It's Fascist
PTI
[ Updated 29 Jul 2011, 14:59:29 ]



Chennai, Jul 29: Slamming the draft communal violence bill as “fascist”, Tamil Nadu Chief Minister Jayalalithaa today said it would give sweeping powers to the Centre and keep the states under constant threat of dismissal.

In a hard-hitting attack on the proposed bill, Jayalalithaa said that under the garb of preventing communal and targeted violence, the Prevention of Communal Violence Bill was yet another “blatant atttempt” to totally bypass the state governments.

The bill concentrates all powers in the Centre rendering the state governments absolutely powerless and totally at the mercy of the Centre,she said in a strongly-worded statement.

Calling it an “undesirable piece of legislation,”, she said it was being brought in by a Central regime that was running “out of steam and ideas for survival.” The AIADMK chief said it was the “sacred duty” of all those who believed in democracy to oppose it in toto and throw it out “lock, stock and barrel,” at the introduction stage itself.

The bill was aimed at keeping the state governments under the constant threat of dismissal, perhaps because of the Central government’s limited capability to use Article 356 of the Constitution in view of a Supreme Court verdict in this regard, the Chief Minister said.

The Prevention of Communal and Targeted Violence (Access to Justice and Reparations) Bill 2011 sought to give “sweeping powers” to the Central government, to the total exclusion of state governments in handling instances of communal and targeted violence, Jayalalithaa said.

She said this vitiated the norms of Centre-state relations envisaged by the Justice Sarkaria Commission. “The Bill appears to be a new ruse to side-step the judicial constraints imposed on the indiscriminate use of Article 356 (to impose President’s rule) against opposition-ruled states by an antagonistic Centre,” Jayalalithaa said. She expressed fears that the Bill, if it became Law, could be misused by politicial parties at the Centre to create a “volatile” situation in an opposition-governed state.

“If the agitators are put down, the state government would be pilloried for stifling dissent. On the other hand, if violence erupts, it can be dubbed as communal or targeted violence and the state government concerned can be dismissed using the sweeping and wholly subjective provisions of the law,” she said.

“This sort of a Catch-22 situation will never be in the interest of a nation on the threshold of being recognised as a super power of the world. This is nothing but an undemocratic and fascist bill which is against and totally repugnant to the basic principles of the constitution,” Jayalalithaa said.

“I also appeal to all right-thinking political parties cutting across political divides, community leaders, thinkers. the free media and the people of this great nation to see the dangers lurking in this Bill and voice their opposition to it in unambiguous terms,” she said.

Slamming various provisions, including terminology and definitions in the proposed Bill, she said their subjective interpretations could lead to misuse, adding, the very purpose of the law is “unstated.” PTI

Jaya opposes 'fascist' communal violence bill

July 29, 2011

Slamming the draft communal violence bill as "fascist", Tamil Nadu Chief Minister Jayalalithaa on Friday said it would give sweeping powers to the Centre and keep the states under constant threat of dismissal.

In a hard-hitting attack on the proposed bill, Jayalalithaa said that under the garb of preventing communal and targeted violence, the Prevention of Communal Violence Bill was yet another "blatant attempt" to totally bypass the state governments.


The bill concentrates all powers in the Centre rendering the state governments absolutely powerless and totally at the mercy of the Centre, she said in a strongly-worded statement.

Calling it an "undesirable piece of legislation,", she said it was being brought in by a Central regime that was running "out of steam and ideas for survival."

The All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam chief said it was the "sacred duty" of all those who believed in democracy to oppose it in toto and throw it out "lock, stock and barrel," at the introduction stage itself.

The bill was aimed at keeping the state governments under the constant threat of dismissal, perhaps because of the Central government's limited capability to use Article 356 of the Constitution in view of a Supreme Court verdict in this regard, the chief minister said.

The Prevention of Communal and Targeted Violence (Access to Justice and Reparations) Bill 2011 sought to give "sweeping powers" to the Central government, to the total exclusion of state governments in handling instances of communal and targeted violence, Jayalalithaa said.

She said this vitiated the norms of Centre-state relations envisaged by the Justice Sarkaria Commission. Section 20, for instance, proposed a "direct assault" on states' autonomy, and was against the spirit of the Constitution, the chief minister added.

It stated that the occurrence of organised communal violence would constitute "internal disturbance," within the meaning of Article 355 (Duty of the Union to protect States against external aggression and internal disturbance) and would always hang like the "sword of Damocles threatening state governments."

The proposed Bill, likely to be presented in the Parliament in the coming session, has drawn lot of flak with critics of the Bill holding that it was "anti-majority."

http://www.rediff.com/news/report/jaya-opposes-fascist-communal-violence-bill/20110729.htm

माओवाद से आधी-अधूरी लड़ाई

माओवाद से आधी-अधूरी लड़ाई
माओवाद पर अंकुश लगाने में विफलता के लिए सरकार की रणनीति को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं बीआर लाल
आज नक्सलवाद और माओवाद की समस्या एक कैंसर का रूप लेती नजर आ रही है। सरकार इस रोग को खत्म करने का जितना प्रयास करती है, यह उतना ही अधिक फैलता जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कमी कहां है और समाधान क्या है? यहां जो सबसे बड़ी भूल की जा रही है वह है नक्सलवाद और माओवाद को एक मान लेना। यही कारण है कि नक्सलवाद को खत्म करने के लिए चलाए जा रहे अभियान विफल और निष्प्रभावी हो रहे हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1990 में मात्र 16 जिलों तक सीमित नक्सलवाद आज देश के 240 जिलों में फैल चुका है। नक्सलवाद के खिलाफ कोई भी रणनीति बनाने से पहले हमें समझना होगा कि माओवाद एक राजनीतिक विचारधारा है जिनका लक्ष्य हिंसा के माध्यम से सत्ता हथियाना है, जबकि नक्सलवादी वे लोग हैं जो देश के विकास का हिस्सा नहीं बन सके हैं। नक्सलवादी बेहद निर्धन, कमजोर और असहाय हैं जो अपनी रोजी-रोटी और तरक्की चाहते हैं। नक्सलवादी विकास और रोजगार चाहते हैं, जबकि माओवादी विकास विरोधी हैं। इस बुनियादी फर्क को समझना होगा। नक्सलवाद में शामिल ज्यादातर लोग जंगलों में रहने वाले आदिवासी और घुमक्कड़ जनजातियों से हैं। माओवादी अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए इस वंचित वर्ग को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। वे इन लोगों को बड़ी आसानी से बहला-फुसला लेते हैं। इस तरह माओवादियों को बहुत कम पैसे में उनकी लड़ाई में साथ देने वाले नक्सली मिल जाते हैं। माओवादी प्रत्येक नक्सली को एक हजार रुपये और उनके परिवार वालों को दो हजार रुपये प्रति माह देते हैं। इस तरह एक नक्सली पर साल भर में कुल 36,000 रुपये खर्च होते हैं। एक अनुमान के मुताबिक पूरे देश में करीब 20 हजार नक्सली हैं। इस तरह पूरे साल उन्हें करीब 72 करोड़ रुपये खर्च करके एक बड़ी सेना मिल जाती है जो अनजाने में अपने ही देशवासियों के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे होते हैं। परंतु सरकार में बैठे नीति-निर्माता इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि उन्हें लड़ाई नक्सलियों से लड़नी है या माओवादियों से? आजादी के बाद हम आर्थिक तरक्की की रफ्तार तेज करने में लगे रहे, लेकिन भूल गए कि पिछड़े क्षेत्र के लोगों को भी विकास में भागीदार बनाया जाए। आज यदि पूर्वोत्तर के हिस्सों से लेकर देश के कुछ अंदरूनी और सीमावर्ती राज्यों में अलगाववाद, नक्सलवाद और उग्रवाद को हवा मिल रही है और उन्हें विदेशियों से मदद मिल रही है तो इसके लिए दोष आखिर किसका है? केवल छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद प्रभावित 1.5 करोड़ लोग हैं। यदि हम इस आबादी को आजीविका के साधन के साथ-साथ यह भरोसा दे सकें कि उन्हें उनकी भूमि से बेदखल नहीं किया जाएगा, उनके क्षेत्र के संसाधनों की लूट नहीं होने दी जाएगी तथा वहां के खनिजों व प्राकृतिक संसाधनों से होने वाली कमाई में उन्हें भी हिस्सा मिलेगा तो शायद ही कोई नक्सली बनना चाहेगा। माओवादी जितना पैसा नक्सलियों और हथियारों की खरीद पर खर्च करते हैं वह विदेश से नहीं आता, बल्कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से लूटे गए प्राकृतिक संसाधनों की एवज में आता है। इस पैसे का सबसे बड़ा स्रोत खनन माफिया उपलब्ध कराते हैं। इसके अलावा विकास के लिए आए सरकारी धन, छोटे-मोटे बिजनेसमैन व नेताओं आदि से भी पैसा जुटाया जाता है। साफ है कि माओवाद-नक्सलवाद से लड़ाई के लिए हमें एक अलग योजना बनाने की जरूरत है। एक तरह जहां हमें नक्सलियों की नियुक्ति के लिए तैयार जमीन यानी रिक्रूटिंग ग्राउंड को खत्म करना होगा वहीं दूसरी ओर इनके आर्थिक स्रोतों को भी बंद करना होगा। इसके लिए दो स्तर पर कार्रवाई करनी होगी। सर्वप्रथम विकास कार्यो में तेजी लाई जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार मिले। इसके लिए नए उद्योग-धंधों के साथ-साथ डेयरी फॉर्म, मछली पालन, हार्टीकल्चर जैसे रोजगारपरक बुनियादी ढांचे का विकास कम पूंजी में आसानी से किया जा सकता है। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के विकास के लिए भी कदम उठाए जाएं। इसके साथ-साथ खनन माफियाओं को खत्म करने व प्राकृतिक संसाधनों की लूट को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं, क्योंकि यही वह स्रोत है जिससे माओवादियों को लड़ाई के लिए पैसा मिलता है। यही क्षेत्र काले धन के सृजन का सबसे बड़ा श्चोत भी है। पूरे देश में 22 करोड़ टन कच्चे लोहे का खनन होता है, जिसमें से अकेले छत्तीसगढ़ का हिस्सा लगभग 4 करोड़ टन का है। एक टन लोहे पर 6-7 हजार की चोरी होती है। इस तरह पूरे देश में करीब एक लाख 10 हजार करोड़ रुपये का और अकेले छत्तीसगढ़ में करीब 20 हजार करोड़ का काला धन खनन ठेकेदारों द्वारा प्रति वर्ष सृजित किया जाता है। इसका एक छोटा हिस्सा, करीब दो हजार करोड़ रुपया, माओवादियों को मिलता है। इससे सहज ही समझा जा सकता है कि नक्सली क्षेत्र का ज्यादा विस्तार खनिज प्रधान इलाकों में ही क्यों हुआ है? यदि माओवादियों को एक लाख नक्सली भी तैयार करने हों तो उन्हें केवल 360 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। इसके अलावा ट्रेनिंग और हथियार खरीदने के लिए शेष रकम जुटाना भी उनके लिए कठिन काम नहीं होगा। नक्सलियों का विस्तार छत्तीसगढ़ से सटे हुए आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और बिहार के एक लाख 50 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है। हम 20 हजार नक्सलियों से ही नहीं लड़ पा रहे हैं। यदि यह संख्या एक लाख हो गई तो क्या होगा इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। केवल ताकत और पुलिस बल के आधार पर नक्सलवाद को काबू में करने की नीति पर सरकार को विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि माओवादियों को तो ताकत से कुचला जा सकता है पर नक्सलवादियों को नहीं। यदि ऐसा होता तो 1967 से शुरू हुए इस आंदोलन का इतना विस्तार नहीं होता। 4 मार्च, 1966 को मिजोरम में मात्र ढाई लाख विद्रोहियों को काबू में करने के लिए बमबारी तक की गई, लेकिन उन्हें हथियारों से दबाया नहीं जा सका और अंतत: 1985 में सरकार को बातचीत की मेज पर बैठना ही पड़ा। कुछ ऐसी ही स्थिति माओवादियों के मामले में भी बनती नजर आ रही है। बेहतर हो कि सरकार समय रहते इस समस्या पर समग्रता में विचार करे ताकि समस्या के समाधान की सही रणनीति बनाई जा सके। (लेखक हरियाणा के पूर्व डीजीपी और सीबीआइ के पूर्व संयुक्त निदेशक हैं)
 http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-07-30&pageno=८
माओवाद पर अंकुश लगाने में विफलता के लिए सरकार की रणनीति को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं बीआर लाल
आज नक्सलवाद और माओवाद की समस्या एक कैंसर का रूप लेती नजर आ रही है। सरकार इस रोग को खत्म करने का जितना प्रयास करती है, यह उतना ही अधिक फैलता जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कमी कहां है और समाधान क्या है? यहां जो सबसे बड़ी भूल की जा रही है वह है नक्सलवाद और माओवाद को एक मान लेना। यही कारण है कि नक्सलवाद को खत्म करने के लिए चलाए जा रहे अभियान विफल और निष्प्रभावी हो रहे हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1990 में मात्र 16 जिलों तक सीमित नक्सलवाद आज देश के 240 जिलों में फैल चुका है। नक्सलवाद के खिलाफ कोई भी रणनीति बनाने से पहले हमें समझना होगा कि माओवाद एक राजनीतिक विचारधारा है जिनका लक्ष्य हिंसा के माध्यम से सत्ता हथियाना है, जबकि नक्सलवादी वे लोग हैं जो देश के विकास का हिस्सा नहीं बन सके हैं। नक्सलवादी बेहद निर्धन, कमजोर और असहाय हैं जो अपनी रोजी-रोटी और तरक्की चाहते हैं। नक्सलवादी विकास और रोजगार चाहते हैं, जबकि माओवादी विकास विरोधी हैं। इस बुनियादी फर्क को समझना होगा। नक्सलवाद में शामिल ज्यादातर लोग जंगलों में रहने वाले आदिवासी और घुमक्कड़ जनजातियों से हैं। माओवादी अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए इस वंचित वर्ग को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। वे इन लोगों को बड़ी आसानी से बहला-फुसला लेते हैं। इस तरह माओवादियों को बहुत कम पैसे में उनकी लड़ाई में साथ देने वाले नक्सली मिल जाते हैं। माओवादी प्रत्येक नक्सली को एक हजार रुपये और उनके परिवार वालों को दो हजार रुपये प्रति माह देते हैं। इस तरह एक नक्सली पर साल भर में कुल 36,000 रुपये खर्च होते हैं। एक अनुमान के मुताबिक पूरे देश में करीब 20 हजार नक्सली हैं। इस तरह पूरे साल उन्हें करीब 72 करोड़ रुपये खर्च करके एक बड़ी सेना मिल जाती है जो अनजाने में अपने ही देशवासियों के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे होते हैं। परंतु सरकार में बैठे नीति-निर्माता इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि उन्हें लड़ाई नक्सलियों से लड़नी है या माओवादियों से? आजादी के बाद हम आर्थिक तरक्की की रफ्तार तेज करने में लगे रहे, लेकिन भूल गए कि पिछड़े क्षेत्र के लोगों को भी विकास में भागीदार बनाया जाए। आज यदि पूर्वोत्तर के हिस्सों से लेकर देश के कुछ अंदरूनी और सीमावर्ती राज्यों में अलगाववाद, नक्सलवाद और उग्रवाद को हवा मिल रही है और उन्हें विदेशियों से मदद मिल रही है तो इसके लिए दोष आखिर किसका है? केवल छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद प्रभावित 1.5 करोड़ लोग हैं। यदि हम इस आबादी को आजीविका के साधन के साथ-साथ यह भरोसा दे सकें कि उन्हें उनकी भूमि से बेदखल नहीं किया जाएगा, उनके क्षेत्र के संसाधनों की लूट नहीं होने दी जाएगी तथा वहां के खनिजों व प्राकृतिक संसाधनों से होने वाली कमाई में उन्हें भी हिस्सा मिलेगा तो शायद ही कोई नक्सली बनना चाहेगा। माओवादी जितना पैसा नक्सलियों और हथियारों की खरीद पर खर्च करते हैं वह विदेश से नहीं आता, बल्कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से लूटे गए प्राकृतिक संसाधनों की एवज में आता है। इस पैसे का सबसे बड़ा स्रोत खनन माफिया उपलब्ध कराते हैं। इसके अलावा विकास के लिए आए सरकारी धन, छोटे-मोटे बिजनेसमैन व नेताओं आदि से भी पैसा जुटाया जाता है। साफ है कि माओवाद-नक्सलवाद से लड़ाई के लिए हमें एक अलग योजना बनाने की जरूरत है। एक तरह जहां हमें नक्सलियों की नियुक्ति के लिए तैयार जमीन यानी रिक्रूटिंग ग्राउंड को खत्म करना होगा वहीं दूसरी ओर इनके आर्थिक स्रोतों को भी बंद करना होगा। इसके लिए दो स्तर पर कार्रवाई करनी होगी। सर्वप्रथम विकास कार्यो में तेजी लाई जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार मिले। इसके लिए नए उद्योग-धंधों के साथ-साथ डेयरी फॉर्म, मछली पालन, हार्टीकल्चर जैसे रोजगारपरक बुनियादी ढांचे का विकास कम पूंजी में आसानी से किया जा सकता है। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के विकास के लिए भी कदम उठाए जाएं। इसके साथ-साथ खनन माफियाओं को खत्म करने व प्राकृतिक संसाधनों की लूट को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं, क्योंकि यही वह स्रोत है जिससे माओवादियों को लड़ाई के लिए पैसा मिलता है। यही क्षेत्र काले धन के सृजन का सबसे बड़ा श्चोत भी है। पूरे देश में 22 करोड़ टन कच्चे लोहे का खनन होता है, जिसमें से अकेले छत्तीसगढ़ का हिस्सा लगभग 4 करोड़ टन का है। एक टन लोहे पर 6-7 हजार की चोरी होती है। इस तरह पूरे देश में करीब एक लाख 10 हजार करोड़ रुपये का और अकेले छत्तीसगढ़ में करीब 20 हजार करोड़ का काला धन खनन ठेकेदारों द्वारा प्रति वर्ष सृजित किया जाता है। इसका एक छोटा हिस्सा, करीब दो हजार करोड़ रुपया, माओवादियों को मिलता है। इससे सहज ही समझा जा सकता है कि नक्सली क्षेत्र का ज्यादा विस्तार खनिज प्रधान इलाकों में ही क्यों हुआ है? यदि माओवादियों को एक लाख नक्सली भी तैयार करने हों तो उन्हें केवल 360 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। इसके अलावा ट्रेनिंग और हथियार खरीदने के लिए शेष रकम जुटाना भी उनके लिए कठिन काम नहीं होगा। नक्सलियों का विस्तार छत्तीसगढ़ से सटे हुए आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और बिहार के एक लाख 50 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है। हम 20 हजार नक्सलियों से ही नहीं लड़ पा रहे हैं। यदि यह संख्या एक लाख हो गई तो क्या होगा इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। केवल ताकत और पुलिस बल के आधार पर नक्सलवाद को काबू में करने की नीति पर सरकार को विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि माओवादियों को तो ताकत से कुचला जा सकता है पर नक्सलवादियों को नहीं। यदि ऐसा होता तो 1967 से शुरू हुए इस आंदोलन का इतना विस्तार नहीं होता। 4 मार्च, 1966 को मिजोरम में मात्र ढाई लाख विद्रोहियों को काबू में करने के लिए बमबारी तक की गई, लेकिन उन्हें हथियारों से दबाया नहीं जा सका और अंतत: 1985 में सरकार को बातचीत की मेज पर बैठना ही पड़ा। कुछ ऐसी ही स्थिति माओवादियों के मामले में भी बनती नजर आ रही है। बेहतर हो कि सरकार समय रहते इस समस्या पर समग्रता में विचार करे ताकि समस्या के समाधान की सही रणनीति बनाई जा सके। (लेखक हरियाणा के पूर्व डीजीपी और सीबीआइ के पूर्व संयुक्त निदेशक हैं)
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