Friday, December 9, 2011

Failure Financial Policy of UPA. Govt

Failure Financial Policy of UPA. Govt

We have Dr. Manmohan Singh as our P.M. ,who is said to be a great Economist of the world, but still during his regime the price rise is beyond his control inspite of several promises time and again. So it is very clear that the Financial Policy of UPA. Govt. is utter failure, because of the wrong steps taken by them again and again, by raising the rate of interest on all bank loans ,as if they are bent upon to ruin India. They have raised the rate of interest on all bank loans 13 time in 19 months, knowing very well that there is price rise, when ever they raise rate of interest.
We all know that , in Indian market the influence of Black Money and the Money invested by foreign investors is much more in comparison to the money of genuine white money investors. So by raising the rate of interest on bank loans the genuine investors are not able to stand in the market and it a blessing for the money of people like A.Raja, Kalmadi, Hassan Ali etc.
More over if a man of USA or UK invests 100 dollars ( about Rs 5,000 ) in his country, after 5 years he will get a return of 110.4 dollars ( the rate of interest in USA or UK is hardly 2%). But if he invests the same Rs. 5,000 ( 100 dollars) in India he can get Rs. 11,438 in the same 5 years . now the cost of one dollar rises from Rs. 50 to Rs. 103 . now the rupee becomes weak and dollar becomes strong. We import petroleum and pay more and raise the price of petroleum ,which causes price rise in all sectors. In India we have very cheap labour , huge Water Resources, huge raw materials. But all these inputs becomes ineffective due to higher rate of interest and our Rupee becomes weak & weak, dollar goes stronger and price rise can not be checked.
During NDA rule the inflation was very low ,it became even 1% , and we have seen that rupee became stronger ( the cost dollar came down to Rs. 39 from Rs. 48). In 1947 ,when India got freedom , the Value of dollar was Rs. 4 only.
We can not think that a great economist like Dr. Manmohan Singh is not aware of this simple fact , but still his action is just reverse for the reasons best known to him only.

Sabrimala Pilgrimage, Pseudo-Secularism, Kerala Tourism


जानबूझकर उकसाने वाली कार्रवाईयाँ और समुचित जवाब – दो घटनाएं…


मित्रों, केरल में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली सबरीमाला यात्रा प्रारम्भ हो चुकी है, इस अवसर पर लाखों हिन्दू श्रद्धालु सबरीमाला की कठिन यात्रा करते हैं, एवं कठोर तप-नियमों का पालन भी करते हैं। परन्तु केरल में पिछले 10 वर्ष के दौरान जिस प्रकार “जिहाद” और “क्रूसेड” का प्रभाव बढ़ रहा है, छोटी-छोटी घटनाओं के द्वारा हिन्दुओं के लिए “संदेश” दिये जा रहे हैं… ऐसी ही दो घटनाएं पेश हैं…

पहली घटना इस प्रकार है –

तमिलनाडु से सबरीमाला यात्रा में आये हुए दो श्रद्धालुओं को 18 नवम्बर के दिन पुन्नालूर के पास एक दुकानदार ने अपने कर्मचारियों के साथ मिलकर पीट दिया। ये दोनों श्रद्धालु उस होटल मालिक से गैरवाजिब रूप से अत्यधिक महंगी रखी गई खाने-पीने की वस्तुओं के बारे में पूछताछ कर रहे थे। दोनों श्रद्धालुओं को चोटें आईं और उन्हें पुनालूर के अस्पताल में भर्ती करना पड़ा, पिछले साल भी इसी स्थान पर श्रद्धालुओं के साथ मारपीट की गई थी, जब श्रद्धालुओं ने होटल में बनने वाले शाकाहारी पदार्थों के साथ माँसाहारी पदार्थ को देख लिया था, और आपत्ति उठाई थी।

असल में सबरीमाला यात्रा के दौरान जुटने वाली भीड़ को देखते हुए दुकानदारों ने मनमाने भाव वसूलना शुरु कर दिए हैं, लेकिन इसका कारण महंगाई अथवा “धंधेबाजी” नहीं है। हकीकत यह है कि सबरीमाला यात्रा के सीजन में हिन्दुओं की बढ़ी हुई आस्था, हिन्दुओं के प्रचार-प्रसार एवं हिन्दू जीवनशैली के बढ़ते प्रभाव को देखकर “जेहादी” और “क्रूसेडर” परेशान हो जाते हैं। वे यह बात नहीं पचा पाते कि इतने जोरदार प्रयासों के बावजूद प्रतिवर्ष सबरीमाला में श्रद्धालुओं की संख्या क्यों बढ़ रही है? पूरे यात्रा मार्ग और आसपास के कस्बों में मछली, माँस, अण्डे इत्यादि के माँसाहारी खाद्य सामग्री बनाने वाले होटलों की आमदनी में इस दौरान भारी गिरावट आ जाती है, क्योंकि जो श्रद्धालु इन माँसाहारी पदार्थों को खाते हैं, वे भी लगभग 2 माह तक इनका त्याग कर देते हैं। इस भारी नुकसान का बदला, ये होटल वाले पानी से लेकर चावल तक के दामों में मनमाने तरीके से भारी बढ़ोतरी करके वसूलते हैं, जिसे लेकर आये दिन श्रद्धालुओं से इनका विवाद होता रहता है।

इस घटना के पश्चात विश्व हिन्दू परिषद एवं स्थानीय हिन्दू ऐक्यवेदी ने सभी श्रद्धालुओं से अनुरोध किया है कि वे सिर्फ़ उन्हीं होटल वालों से सामान खरीदें, जहाँ इस बात का स्पष्ट उल्लेख और सख्त पालन हो कि उनके यहाँ “सिर्फ़” शाकाहारी भोजन मिलता है।

कहाँ तो एक ओर अमरनाथ यात्रा के समय देश के विभिन्न हिस्सों से सिख और जैन मारवाड़ी बन्धु समूचे यात्रा मार्ग पर यात्रियों को मुफ़्त में लंगर-भोजन करवाते हैं, और कहाँ एक ओर सबरीमाला की यात्रा में श्रद्धालुओं से अधिक भाव लेकर उन्हें लूटा जा रहा है… और यह सिर्फ़ होटल और लॉज वालों तक ही सीमित नहीं है, प्राप्त सूचना के अनुसार बस ट्रांसपोर्ट व्यवसाय पर भी एक “वर्ग विशेष” का कब्जा है एवं वे सबरीमाला के हिन्दू यात्रियों से मनमाना किराया वसूलते हैं और अभद्रता भी करते हैं…। इस घटनाक्रम का एक पहलू यह भी रहा कि मारपीट और श्रद्धालुओं के घायल होने की खबर के पश्चात हिन्दू संगठनों ने सड़क किनारे चल रहे उस अवैध होटल को तहस-नहस कर दिया, जिसके पश्चात सरकार ने मनमाने दामों पर लगाम लगाने का फ़ैसला किया है…।


दूसरी घटना भी हिन्दुओं को जानबूझकर उकसाने वाली है -

कुछ समय पहले इसी ब्लॉग पर आपने “मुथूट फ़ायनेंस कम्पनी द्वारा सिन्दूर-बिन्दी पर प्रतिबन्ध” लगाने वाले सर्कुलर के बारे में पढ़ा था (http://blog.sureshchiplunkar.com/2011/09/muthoot-finance-anti-hindu-circular-ban.html), प्रस्तुत घटना भी इसी से मिलती जुलती है। 


जैसी की परम्परा है सबरीमाला के भक्तगण इस पवित्र उत्सव एवं पूजा के दौरान काले कपड़े अथवा काली लुंगी या धोती धारण करते हैं। चलाकुडी स्थित एक ईसाई संस्था, “निर्मला कॉलेज” ने उन सभी छात्रों को एक नोटिस जारी करके कहा कि कोई भी छात्र काली धोती या काली लुंगी पहनकर कॉलेज नहीं आ सकता। कुछ छात्रों ने इस नोटिस की अवहेलना की तो उन पर भारी जुर्माना ठोंका गया जबकि कुछ छात्रों को कॉलेज से निकालने की धमकी दी गई। हिन्दू छात्रों पर इस खुल्लमखुल्ला प्रतिबन्ध वाले सर्कुलर पर प्रिंसिपल सजीव वट्टोली के हस्ताक्षर हैं। इस सर्कुलर का वाचन सभी छात्रों के समक्ष जानबूझकर सार्वजनिक रूप से जोर से पढ़ा गया।

जब इस घटना का पता हिन्दू ऐक्यवेदी संगठन को लगा, तो उन्होंने कॉलेज प्रबन्धन का घेराव और धरना किया, जिसके बाद कॉलेज प्रशासन ने उन छात्रों की पेनल्टी फ़ीस वापस की तथा जिन्हें कॉलेज से बाहर करने का नोटिस दिया गया था, वह भी वापस लिया गया…।

इस प्रकार की घटनाएं अब केरल, पश्चिम बंग और असम में आम हो चली हैं। चूंकि हिन्दुओं में “नकली सेकुलरों” और “जयचन्दों” की भरमार है, इसलिए उन्हें ऐसी घटनाएं “छोटी-मोटी”(?) प्रतीत होती हैं, लेकिन यदि ध्यान से देखें तो ऐसी कार्रवाईयों और निर्देशों के जरिए हिन्दुओं को कुछ “स्पष्ट संदेश” दिये जा रहे हैं।

मुथूट फ़ायनेंस वाले मामले में डॉ स्वामी द्वारा कम्पनी के प्रबन्धक को जब कोर्ट केस करने की धमकी दी, तब कहीं जाकर सिन्दूर-बिन्दी पर प्रतिबन्ध वाले सर्कुलर को वापस लिया गया…। हालांकि इन दोनों घटनाओं में भी हिन्दू संगठनों द्वारा त्वरित कार्रवाई करके मामला सुलझा लिया, लेकिन “नीयत” का इलाज कैसे होगा?
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नोट :- यदि सोनिया गाँधी की NAC द्वारा पोषित “साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा बिल 2011” नामक काला कानून पास हो गया, तो ऊपर उल्लिखित घटना में होटल का मालिक, उन श्रद्धालुओं को पीटता भी और उन्हीं पर केस भी दर्ज करवाता, जिसमें उनकी जमानत भी नहीं होती। कुम्भकर्ण रूपी मूर्ख हिन्दुओं को यदि इस “ड्रेकुला कानून” के बारे में अधिक से अधिक जानना हो तो इस लिंक पर जा सकते हैं

Shocking: Kabaddi World Cup champions go home by auto rickshaw


Shocking: Kabaddi World Cup champions go home by auto rickshaw


Ludhiana: Hours after they won the World Cup with a thumping victory over England, Indian women Kabaddi players were seen on the streets waiting for auto rickshaw to reach home. The players who made the country proud on Sunday were badly treated by their team management. The players were not provided conveyance to reach their home.

Moreover, the game officials didn’t even pay the hotel bills on time leading to the embarrassment of the players. While checking out, the players were stopped by the hotel staff for non payment of their food bills.

The arrangements for the stay of players were made in Park Plaza hotel. According to the hotel officials, food bill worth Rs 22,000 was due on the players which the game officials hadn’t paid. The players were made to wait at the hotel reception for two hours and were allowed to check out only after their bills were paid.

Punjab Sports Director Pargat Singh said the arrangements for the kabaddi players were made by the organising committee. “We fulfilled all the demands made by the team management. If the players faced an inconvenient it’s the responsibility of the team management,” said Singh.

After checking out, the players, with prize in their hand, were seen standing on the streets waiting for public transport. Most of them went their home walking.

Players told that they had to spend the entire week in one pair of clothes as their luggage got burnt in the bus accident ahead of the semi0final clash. The team management didn’t arrange for fresh pair of clothes for the players.

Conversion in Kashmir, Islam and Conversion, Missionary Activity in India



ईसाई धर्मांतरण को रोकने का इस्लामी तरीका… हिन्दुओं के बस की बात नहीं ये… (सन्दर्भ - कश्मीर में धर्मान्तरण)

घटना इस प्रकार है कि, कुछ समय पहले श्रीनगर स्थित चर्च के रेव्हरेंड (चन्द्रमणि खन्ना) यानी सीएम खन्ना(?) (नाम पढ़कर चौंकिये नहीं… ऐसे कई हिन्दू नामधारी फ़र्जी ईसाई हमारे-आपके बीच मौजूद हैं) ने घाटी के सात मुस्लिम युवकों को बहला-फ़ुसलाकर उन्हें इस्लाम छोड़, ईसाई धर्म अपनाने हेतु राजी कर लिया। जब यह मामला खुल गया, तो 19 नवम्बर को रेव्हरेण्ड खन्ना को श्रीनगर स्थित मुख्य मुफ़्ती बशीरुद्दीन ने खन्ना को शरीयत कोर्ट(?) में जवाब-तलब के लिए बुलवाया। खन्ना साहब से चार घण्टे तक पूछताछ(?) की गई। उन सभी सात मुस्लिम युवकों की पुलिस ने जमकर पिटाई की, जिन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार किया था, फ़िर उन युवकों से रेव्हरेण्ड खन्ना के खिलाफ़ कबूलनामा लिखवा लिया गया कि उसने पैसों का लालच देकर उन्हें ईसाई धर्म के प्रति बरगलाया (यही सच भी था)।(Know more about Shariah Court... http://expressbuzz.com/opinion/columnists/sharia-courts-rule-in-jk-secularists-keep-mum/337356.html)

इतना सब हो चुकने के बाद राज्य की धर्मनिरपेक्षसरकार ने अपना रोल प्रारम्भ किया। बशीरुद्दीन कीधमकी(?) के बाद सबसे पहले तो रेव्हरेण्ड खन्ना को गिरफ़्तार किया गया…। चूंकि गुजरात, तमिलनाडु, मध्य्रप्रदेश की तरह जम्मू-कश्मीर में धर्मान्तरण विरोधी कानून नहीं है (क्योंकि कभी सोचा ही नहीं था, कि मुस्लिम बहुल इलाके में कोई पादरी इतनी हिम्मत करेगा), इसलिये अब उस पर 153तथा 295की धाराएं लगाई गईं अर्थात धार्मिक वैमनस्यता फ़ैलानेनस्लवाद भड़काने और अशांति फ़ैलाने की, ताकि चन्द्रमणि खन्ना को आसानी से छुटकारा न मिल सके… क्योंकि उसने इस्लाम के अनुसार मुस्लिमों का धर्म परिवर्तन करवा कर सिर्फ़ अपराध नहीं बल्किपाप किया था। मौलाना बशीरुद्दीन ने कहा है कि शरीयत अपना काम करेगी, और सरकार को अपना काम करना होगा…, यह एक गम्भीर मसला है और इस्लाम में इससे निपटने के कई तरीके हैं। 

इन मुस्लिम युवकों के धर्मान्तरण की वीडियो क्लिप यू-ट्यूब पर आने के बाद पादरी खन्ना और वेटिकन के खिलाफ़ घृणा संदेशों की मानो बाढ़ सी आ गई, जिसमें वादाकिया गया है कि यदि खन्ना को उचित सजा नहीं मिली तो कश्मीर से मिशनरियों के सभी स्कूल, इमारतें और चर्च इत्यादि जला दिए जाएंगे… मजे की बात यह है कि धमकी भरे ईमेल कश्मीर के साथ-साथ पाकिस्तान से भी भेजे जा रहे हैं। 

समूचे मामले का तीन तरह से विश्लेषण किया जा सकता है, और तीनों ही विश्लेषण तीन विभिन्न समूहों को पूरी तरह बेनकाब करते हैं…

1) सबसे पहले बेनकाब होते हैं तमाम ईसाई संगठन तथा सजन जॉर्ज एवं जॉन दयाल जैसे स्वघोषित ईसाई बुद्धिजीवी… (लेकिन असलियत में धर्मान्तरण के समर्थक घोर एवेंजेलिस्ट)। भाजपा शासित राज्यों सहित पूरे देश में मिशनरी गतिविधियों के जरिये दनदनाते हुए दलितों-आदिवासियों और गरीब हिन्दुओं को ईसाई धर्म में खींचने-लपेटने में लगे हुए ईसाई संगठन, कश्मीर के इस मसले पर शुरुआत में तो चुप्पी साध गये, फ़िर धीमे-धीमे सुरों में इन्होंने विरोध शुरु किया। प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति और सोनिया गाँधी के समक्ष, धर्मान्तरण की गतिविधि संविधान सम्मत है…कश्मीर में जो हुआ वह गलत और असंवैधानिक तथा धार्मिक स्वतन्त्रता का हनन है… तथा कश्मीर के तालिबानीकरण पर चिंता जताते हैं… जैसे वाक्यों और घोषणाओं से शिकायत करते रहे। लेकिन इस्लामिक मामलों में और खासकर कश्मीर के मामले में प्रधानमंत्री की क्या औकात है कि वे कुछ करें… सो कुछ नहीं हुआ। फ़िलहाल डायोसीज़ चर्च और वेटिकन के उच्चाधिकारी रेव्हरेण्ड खन्ना के साथ हुए सलूक पर सिर्फ़ प्रलाप भर कर रहे हैं, कुछ कर सकने की उनकी न तो हिम्मत है और न ही औकात…। यह बात पहले भी केरल में साबित हो चुकी है, जब एक ईसाई प्रोफ़ेसर का हाथ, कुछ इस्लामिक पागलों ने काट दिया था… तब भी भारतीय चर्च, हिन्दुओं को सरेआम ईसाई बनाते एवेंजेलिस्ट और वेटिकन के सारे गुर्गे, सिमी द्वारा संचालित इस्लामी जेहाद के सामने दुम दबाकर घर बैठ गये थे…। तात्पर्य यह कि ईसाई संगठनों द्वारा किये जाने वाले धर्मान्तरण सम्बन्धी सारे संवैधानिक अधिकार(?) और दादागिरी सिर्फ़ हिन्दुओं पर ही चलती है, जैसे ही कोई इस्लामी जेहादी इन्हें इनकी औकात बताता है तो ये चुप्पी साध लेते हैं या मन मसोसकर रह जाते हैं…

पता कीजिये कि गरीबों की सेवा(?)  के नाम पर चल रही कितनी मिशनरियाँ, मुस्लिम बहुल इलाके में अपना कामकाज कर रही हैं?  क्या मुसलमानों में गरीबी नहीं है? तो फ़िर मिशनरी संस्थाओं को "सेवा" के लिए दलित-आदिवासी बस्तियाँ ही क्यों मिलती हैं?

2) इस घटना से इस्लाम के तथाकथित स्वयंभू ठेकेदार भी बेनकाब होते हैं, क्योंकि जहाँ एक तरफ़ उन गरीब मुस्लिम नौजवानों (जो पैसे के लालच में ईसाई बने), उन पर फ़िलहाल कोई कार्रवाई नहीं की जा रही, जबकि रेव्हरेण्ड खन्ना को रगड़ा जा रहा है। इसी प्रकार इस्लाम की अजब-गजब परिभाषाओं के अनुसार जो भी व्यक्ति पवित्र इस्लाम में प्रवेश करता है, उसका स्वागत है… इसमें आने वाले और लाने वाले दोनों को ईनाम दिया जाता है (जैसा कि लव-जेहाद के कई मामलों में कर्नाटक व केरल पुलिस ने पाया है कि मुस्लिम लड़कों को हिन्दू लड़की फ़ँसा कर लाने पर दो-दो लाख रुपये तक दिये गये हैं)। वहीं दूसरी ओर, पाखण्ड की इन्तेहा यह है कि बशीरुद्दीन साहब फ़रमाते हैं कि इस्लाम छोड़कर जाना गुनाह-ए-अज़ीम (महापाप) है…। यानी इस्लाम में आने वाले को ईनाम और इस्लाम छोड़कर जाने वाले को कठोर दण्ड… यह है शांति का धर्म (Religion of Peace)?

3) बेनकाब होने की श्रृंखला में तीसरा नम्बर आता है, हमारे सुपर ढोंगी सेकुलरों औरवामपंथी बुद्धिजीवियों(?) का…। पाठकों को याद होंगे दो मामले, पहला कोलकाता के रिज़वानुर रहमान और उद्योगपति अशोक तोडी की लड़की का प्रेम प्रसंग (Search - Ashok Todi and Rizvanur Rehman Case) एवं कश्मीर में अमीना और रजनीश का प्रेम प्रसंग (Search - Ameena and Rajneesh Love story of Kashmir)। झोला छाप वामपंथी बुद्धिजीवियों एवं पाखण्ड से लबरेज धर्मनिरपेक्षों ने रिज़वानुर रहमान की हत्या पर कैसा रुदालीगान किया था, जबकि कश्मीर में इस्लामी उग्रवादियों द्वारा रजनीश की हत्या पर चुप्पी साध ली थी…। ये लोग ऐसे ही गिरे हुए होते हैं, उदाहरण - गोधरा ट्रेन जलाने पर कपड़ा-फ़ाड़ चिल्लाना, लेकिन मुम्बई की राधाबाई चाल में हिन्दुओं को जलाने पर चुप्पी…, फ़िलीस्तीन के मुसलमानों के लिये बुक्का फ़ाड़कर रोना, लेकिन कश्मीरी पण्डितों के मामले में चुप्पी…, गुजरात के दंगों को नरसंहार बताना, लेकिन सिखों के नरसंहार के बावजूद कांग्रेस की गोद में बैठना इत्यादि-इत्यादि। इनका ऐन यही रवैया, कश्मीर के इस धर्मान्तरण मामले को लेकर भी रहा… आए दिन भाजपा-संघ को अनुशासन, संविधान, अल्पसंख्यकों के अधिकारों आदि पर भाषण पिलाने वाले महेश भट्ट, शबाना आज़मी और तीस्ता नुमा सारे बुद्धिजीवी अपनी-अपनी खोल के अन्दर दुबक गये…। किसी ने भी बशीरुद्दीन और उमर अब्दुल्ला सरकार को पाठ पढ़ाने की कोशिश नहीं की, क्योंकि उन्हें मालूम है कि यदि वे इस्लाम के खिलाफ़ एक शब्द भी बोलेंगे तो उनका पिछवाड़ा लाल कर दिया जाएगा…। जॉन दयाल, सीताराम येचुरी अथवा सैयद शहाबुद्दीन साहब ने एक बार भी नहीं कहा, कि कश्मीर में पादरी खन्ना के खिलाफ़ जो भी कार्रवाई हो वह भारत के संविधान के अनुसार हो… शरीयत कोर्ट कौन होता है फ़ैसला करने वाला? लेकिन ज़ाहिर है कि जिसके पास ताकत है, उसी की बात चलेगी और ठोकने-लतियाने तथा हाथ काटने की ताकत फ़िलहाल इस्लाम के पास है, जबकि हिन्दू ठहरे नम्बर एक के बुद्धू, सेकुलर और गाँधीवादी…, उनके खिलाफ़ तो कुछ भी (जी हाँ, कुछ भी) किया जा सकता है…। क्योंकि भाजपा में भी अब कांग्रेस बी टीम बनने की होड़ चल पड़ी है, तो रीढ़ की हड्डी सीधी करके धार्मिक मामलों पर भाजपा के नेता खुलकर क्यों और कैसे बोलें? जबकि स्थापित तथ्य यह है किविशेष परिस्थितियों (गुजरात एवं मध्यप्रदेश के चन्द चुनावों) को छोड़कर चाहे भाजपाई नेता, सार्वजनिक रूप से मुस्लिमों के चरण धोकर भी पिएं तब भी वे भाजपा को वोट देने वाले नहीं हैं… फ़िर भी भाजपा को यह पूछने में संकोच(?) हो रहा है किशरीयत बड़ी या भारत का संविधान?

प्रस्तुत घटना यदि किसी भाजपा शासित राज्य में हुई होती तथा बजरंग दल अथवा श्रीराम सेना ने इस घटना को अंजाम दिया होता, तो अब तक भारत के समूचे मीडियाई भाण्डों, नकली सेकुलरिज़्म का झण्डा उठाये घूमने वाले बुद्धिजीवियों सहितप्रगतिशील(?) वामपंथियों ने कपड़े फ़ाड़-फ़ाड़कर, आसमान सिर पर उठा लिया होता… परन्तु चूंकि यह घटना कश्मीर की है तथा इसमें इस्लामी फ़तवे का तत्व शामिल है, इसलिए दोगले सेकुलरों और फ़र्जी वामपंथियों के मुँह पर बड़ा सा ताला जड़ गया है…राष्ट्रीय(?) मीडिया की तो वैसे भी हिम्मत और औकात नहीं है कि वे इस घटना को कवरेज दे सकें…।

वाकई, सेकुलरिज़्म और गाँधीवाद ने मानसिक रूप से भारतवासियों (सॉरी… हिन्दुओं) को इतना खोखला और डरपोक बना दिया है, कि वे वाजिब बात का विरोध भी नहीं कर पाते… 
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नोट :- ताज़ा समाचार यह है कि "शरीयत कोर्ट" ने कश्मीर विवि के कुछ प्रोफ़ेसरों को भी उसके समक्ष पेश होने का नोटिस जारी किया है, क्योंकि खन्ना ने स्वीकार किया है कि मुस्लिम युवकों का धर्मान्तरण करवाने में इन्होंने उसकी मदद की थी…। दूसरी तरफ़ पादरी खन्ना की पत्नी और बेटे ने उनके "गिरते स्वास्थ्य" को देखते हुए उमर अब्दुल्ला से उन्हें रिहा करने की अपील की है। पत्नी ने एक बयान में कहा है कि कश्मीर में आए भूकम्प के दौरान पादरी खन्ना और चर्च ने सेवाभाव से गरीबों की मदद की थी, उनके पुनर्वास में विभिन्न NGOs के साथ मिलकर काम किया था… (इस स्वीकारोक्ति का अर्थ समझे आप? थोड़ा गहराई से विचार कीजिए, समझ जाएंगे)। 

फ़िलहाल तो इस मामले में "धर्मनिरपेक्षों" और "स्वयंभू मानवाधिकारवादियों" की साँप-छछूंदरनुमा हालत, दोगलेपन और पाखण्ड पर तरस खाईये और मुस्कुराईये…।

Ankita Nagarkar (IGNITE winner) awarded by Dr APJ Abdul Kalam.


Such simple kaizens can solve many problems in our day to day working. Think positive and look around your work stations, you will find many opportunities for improvement.


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Kaizen: Stapler that indicates pins are finishing


Class 10th student of St. Ursula High school, Pune, (now studying in XI : Akurdi-based Shri Mhalsakant Junior College) Maharashtra has done very good kaizen, a very simple solution to her problem…

This problem has been faced by most of us. Every time pins in the stapler get finished, we are caught unaware. Ankita Nagarkar was sitting and stapling some papers one day when suddenly the staple pins finished.

Her father asked her why she didn't know that they were about to finish? He asked her to think of a way to ensure that the next time she knows beforehand that the staples were coming to an end.

This got Ankita thinking. She came up with the idea to paint the last three staple pins with nail polish. But the paint was too thick.
Then she substituted that by using a permanent marker and that worked well. This worked well and it helped in indicating that the pins were coming to an end. It saved on time, is easily adaptable and easy to use at no extra cost.