Tuesday, December 4, 2012

Hindus in Bharat will not Tolerate ‘Babur’ Styled atrocities in Pakistan-VHP- Dr. Pravin Togadia


Hindus in Bharat will not Tolerate ‘Babur’ Styled atrocities in Pakistan
Karnavati (Ahmedabad), December 3, 2012
Over 100 years old Bhagwan Shriram Temple in Pakistan was razed to ground along with over 40 houses of Hindus around it. In Sindh province of Pakistan, Hindus had approached the court against the builder’s efforts to demolish the Shriram Temple & the court had granted stay. Yet the builder in connivance of Govt officials demolished the temple & Hindu houses looting precious ancient jewelry of the temple. Hindus have protested in front of Karachi Press Club.
VHP International Working President Dr Pravin Togadia reacted, “It is the same Babur mentality which gets them demolish Hindu temples. It was Ayodhya then where Babur demolished Bhagwan Shriram’s birth place temple & now it is Pakistan. This is not the first time that Pakistan has encouraged such an act against Hindus. Thousands of ancient temples have already been razed to ground in Pakistan & Kashmir since past many decades & Hindus are being victimized brutally. Recently thousands of Hindus were hoarded out of Pakistan. After reaching Bharat at Wagha border & in Rajasthan as well, Govt of India has not helped them in anyways. VHP has been running relief camps for them along with other Hindu organizations. Now razing Bhagwan Shriram temple in Pakistan again is a blatant slap on the face of Indian Govt who in the name of peace & love is holing Cricket matches with Pakistan issuing 3000 visas to Pakistanis. Indian Govt is turning purposeful blind eye to temple demolitions, rapes of Hindu girls. Forcible conversions, abductions coupled with extortions & forcing Hindus to run away to Bharat.”
Dr Togadia demanded:
1.    Indian Govt should immediately sever all relations with Pakistan – be it Trade, sports or any other.
2.    Atrocities on Hindus in Pakistan is an international issue of Human Rights violation. Govt of India as well as Human Rights groups should immediately take this up with the International Courts & with the UN. VHP has already taken it up & plans to intensify democratic protests.  
3.    Govt of India should prevail on Pakistan to rebuild all demolished temples & get an international treaty signed by Pakistan not to touch any other temple anymore.
Dr Togadia further said, “Injustice to Hindus in Pakistan has reached to its utmost levels now. Hindus in Pakistan are vulnerable whereas Muslims in Bharat are being wooed & helped by Indian govt for votes. Only hanging Kasab is not enough; the terror that Pakistan has been forcing on to Hindus there should also be strictly handled by the Indian Govt. Hindus in Bharat & in the world have been extremely upset about these atrocities. Peace & good relations are not the responsibility only of Hindus in Bharat when fellow Hindus are being brutalized in Pakistan & both Govts need to understand it. The judiciaries that take suo motto notes of complaints of Muslims in Bharat should also need to open their eyes to such blatant terror to Hindus in Pakistan. VHP will protest against Bhagwan Shriram temple demolition in Pakistan & if the Govt of India does not get it rebuilt in a fortnight, then there could be nation-wide democratic demonstrations.”

Monday, December 3, 2012

Catholic church in denger


कॅथॉलिक चर्च खतरे में?

रोमन कॅथॉलिक चर्च खतरे में हैऐसा लगता है. कैसा संकटउत्तर है अस्तित्व का संकट. २०१२ के ईअर बुक के अनुसार दुनिया में करीब २२५ करोड़ लोग ईसाई धर्म को मानने वाले हैउनमें ७५ से ८० प्रतिशत रोमन कॅथॉलिक है.
इस चर्च के मुखिया को पोप कहते है. इस चर्च का अपना एक छोटा राज्य है. उस राज्य का नाम है व्हॅटिकन’. वह इतना छोटा है कि उसकी जानकारी बहुत मनोरंजक लगती है. उसका क्षेत्रफल पूरा आधा किलोमीटर भी नहीं है. जनसंख्या एक हजार से भी कम. उसकी राजधानी है व्हॅटिकन सिटी. वह चारों ओर से इटाली की राजधानी रोम से घिरी है. लेकिनउसका अपना रेल स्टेशन है. डाक सेवा है. स्वतंत्र मुद्रा है. रेडिओ स्टेशन भी है. इतना ही नहीं तो उनकी अपनी पुलीस और न्यायालय भी है. आज के पोप है बेनेडिक्ट १६ वे. इसका अर्थ इसके पूर्व बेनेडिक्ट नाम के १५ पोप हो चुके है. उनकी आयु आज ८५ वर्ष है. पोप बनने के पहले उनका नाम था जोसेफ राझिंगर.

एकसंध चर्च
एक जमाना ऐसा था किसंपूर्ण ईसाई दुनिया पर पोप की अधिसत्ता थी. राजा कौन बनेगायह पोप बताते थे. राजा किसके साथ विवाह करेंतलाक ले या नहींयह भी पोप ही बताते थे. करीब डेढ हजार वर्ष इस प्रकार पोप कीधार्मिक और राजनीतिक इन दोनों क्षेत्रों में अधिसत्ता चलती रही. लेकिन १५ वी शताब्दी में जर्मनी में पैदा हुए मार्टिन ल्यूथर (सन् १४८३-१५४६) इस धर्मसुधारक ने पोप की अधिसत्ता को आव्हान दिया. उसने अपना एक पंथ भी स्थापन किया. उसका नाम है प्रॉटेस्टंट’. ‘प्रोटेस्ट’ इस अंग्रेजी धातु का अर्थ निषेध’ करना है. पोप की अधिसत्ता का जिस मार्टिन ल्यूथर के अनुयायीयों ने निषेध कियावे सब प्रॉटेस्टंट’ बने. मतलब प्रॉटेस्टंट’ यह भी ईसाई धर्म का ही एक पंथ है. लेकिन इस पंथ के अनेक उपपंथ है. २००१ में प्रॉटेस्टंट चर्च के प्रतिनिधियों के साथ तत्कालीन सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी की चर्चानागुपर के संघ कार्यालय में हुई थीउस चर्चा में प्रॉटेस्टंटों के २७ उपपंथों के प्रतिनिधियों का समावेश था. प्रॉटेस्टंटों के अलावा, ‘ऑर्थोडॉक्स चर्च’ यह भी एक ईसाई उपपंथ है और वह भी पोप की अधिसत्ता नहीं मानता. लेकिन इन सब पोप विरोधी कहे या रोमन कॅथॉलिक से अलग कहेईसाईयों की संख्या २५ प्रतिशत से अधिक नहीं. रोमन कॅथॉलिक चर्च की यह विशेषता है कि वह पंथ इतने वर्ष बाद भी एकसंध है. धर्माचार्यों की (कार्डिनल) सभा पोप का चुनाव करती है और दुनिया के सब देशों के कॅथॉलिक उसकी सत्ता मान्य करते हैं.

निजि पत्रों की चोरी
१६ वे बेनेडिक्ट के संदर्भ में हाल ही में एक समाचार प्रकाशित हुआ है. वह उनके रसोइये से संबंधित है. इस रसोइये का नाम पावलो गॅब्रिएल है. उसके ऊपर आरोप है या कहे कि थाकी उसने पोप महाशय के कुछ गोपनीय निजि पत्र चुराए और वह जियानलुगी नुझ्झी इस इटली के पत्रकार को दिये. पत्रकार नुझ्झी ने उन पत्रों के आधार पर 'His Holiness Pope Benedict XVI's Secret Papers' इस शीर्षक की एक पुस्तक ही लिख डालीऔर गत मई माह में उसका प्रकाशन भी किया. इससे सब तरफ खलबली मच गई. पोप की पुलीस ने इस मामले की खोज की और पोप के लिए छ: वर्षों से रसोइये का काम करने वाले पावलो गॅबिएल को पकड़ा. उसके विरुद्ध मुकद्दमा चलाया गया और उसे १८ माह के कारावास की सज़ा सुनाई गई. व्हेटिकन में अलग कारागृह न होने के कारणगॅब्रिएल को उसके घर में ही बंद रखा गया.

चर्च में के लफड़े
नुझ्झी की पुस्तक में चर्च में के अंतर्गत लफड़ों और झगडों की भी जानकारी है. आर्थिक भ्रष्टाचार और समलिंगी व्यक्तियों के घृणास्पद लैंगिक आदतों का भी उसमें वर्णन है. स्वाभाविक ही यूरोप के समाचारपत्रों में नुझ्झी की इस पुस्तक को भरपूर प्रसिद्धि मिली. नुझ्झी नेगॅब्रिएल का बचाव करने की भी कोशिश कीउसका कहना है किगॅब्रिएल ने चुराये’ पत्रों में राज्य के व्यवहार या फौज की गोपनीय जानकारी नहीं है. उसका उद्देश्य अच्छा था. चर्च का व्यवहार पारदर्शक हो ऐसा उसे लगता था. उसने वहॉं जो अवांछनीय कारनामें देखेंउससे वह व्यथित हुआऔर चर्च का कारोबार दुरूस्त होधर्म संस्था के अनुरूप निर्मल पद्धति से चलेइसी उद्देश्य सेउसने उन पत्रों की छायाप्रत निकाली. गॅब्रिएल के वकील ने भी अपने मुवक्किल का बचाव करते समय जोर देकर कहा किउसने पत्र चुराये नहीं. केवल उनकी छायाप्रत बनाई और ऐसा करने में उसका उद्देश्य अच्छा था. इसलिए पोप उसे क्षमा करें. अब पोप १६ वे बेनेडिक्ट उसे क्षमा करते है या उर्वरित सज़ा भुगतने के लिए इटली के किसी कारागृह में भेजते हैइसकी ओर लोगों का ध्यान लगा है. गत जुलाई माह से गॅब्रिएल कैद में है.

सायनड’ का अधिवेशन
इस सारे काण्ड से पोप बेनेडिक्ट बहुत ही अस्वस्थ हुए. उन्होंने इसी अक्टूबर माह में चर्च केधर्माचार्यों की एक सभा बुलाई. इस सभा को सायनड’ कहते है. इस सायनड’ में २६२ धर्माचार्य उपस्थित थे. उनमें कार्डिनल (मतलब पोप के दर्जे से कम लेकिन अन्य सब से श्रेष्ठ दर्जे के धर्माचार्य. ये धर्माचार्य ही पोप का चुनाव करते है)बिशप और प्रीस्ट (मतलब पुजारियों) का समावेश था. वे केवल यूरोप के ही नहीं थेदूनिया भर से उन्हें बुलाया गया था. धर्माचार्यों की सभा तीन सप्ताह चलने की अपेक्षा है.

एक पहेली
इस सभा के आरंभ में पोप बेनेडिक्ट ने किया भाषण महत्त्व का है. लेकिनअपने उद्घाटन का भाषण आरंभ करने के पूर्व पोप महाशय ने डॉक्टर ऑफ द चर्च’ इस कॅथॉलिक चर्च की व्यवस्था में की सर्वोच्च पदवी सेइतिहास में हुए दो श्रेष्ठ धर्मोपदेशकों का गौरव किया. उनमें के एक थे १२ वी शति में हुए - मतलब करीब एक हजार वर्ष पूर्व हुए - जर्मन गूढवादी (मिस्टिक) सेंट हिल्डेगार्ड और दूसरे थे १६ वी शति के स्पॅनिश धर्मोपदेशक सेंट जॉन ऑफ् ऍव्हिला. चर्च के दो हजार वर्षों के इतिहास में आज तक केवल ३३ व्यक्तियों को ही इस सर्वश्रेष्ठ पदवी से नवाजा गया है. लेकिन बेनेडिक्ट महोदय ने इसी समय यह गौरव समर्पण का कार्यक्रम क्यों कियायह एक पहेली है.

पोप की चिंता
इन धर्माचार्यों की सभा की अधिकृत जानकारी इतने जल्दी मिलने की संभावना नहीं है. यह लेख वाचकों तक पहुँचेगा तब भी शायद वह सायनड’ समाप्त नहीं हुआ होगा. लेकिन अब तक जो जानकारी मिली हैउससे ऐसा लगता है किकॅथॉलिक चर्च को मानने वाले जो लोग दुनिया भर में फैले हैंउनका वर्तन देखकर पोप महाशय अत्यंत उद्विग्न हुए है. उनका कहना है कियूरोप और अमेरिका के, मतलब मुख्यत: कॅनडा इस उत्तर अमेरिका के और दक्षिण अमेरिका के ब्राझीलचिलीपेरूअर्जेंटिना आदि अधिकांश कॅथॉलिक देशों केकॅथॉलिक लोग केवल कहने को ही कॅथॉलिक रहे हैं. वे नियमित रूप से रविवार को चर्च में भी नहीं जाते. अनेक चर्च की इमारतें खाली पड़ी है. वह बिक रही हैऔर उनकी दृष्टि से महत्त्व और चिंता की बात यह है कि यह खाली पड़े चर्चगृह मुसलमान खरीद रहे हैं और वहॉं अपनी मस्जिदें बना रहे हैं. इसलिए उनका आवाहन है किसब कॅथॉलिक उनके नियमित उपासना कांड का कड़ाई से पालन करे.
गत ११ अक्टूबर कोयह वर्ष सब लोग (अर्थात् ईसाई) ईअर ऑफ द फेथ’ मतलब श्रद्धा का वर्ष मानेऐसा आवाहन उन्होंने किया. पचास वर्ष पूर्व ११ अक्टूबर को ही मतलब १९६२ से १९६५ दूसरी कॅथॉलिक कौन्सिलने जो निर्णय लिये थेउस कारण कॅथॉलिक पंथ की पहचान ही बदल गई थी. और तब से इस पंथ के धर्मोपदेशक अधिक सक्रिय हो गए थे.

सेक्युलॅरिझम्
रोमन कॅथॉलिक चर्च दो बातों से खतरा अनुभव करता है. उनमें से एक है सेक्युलॅरिझम् संबंधि ईसाई राष्ट्रों के शासकों की बढ़ती पसंद और दूसरी है इस्लाम का प्रसार. अधिकांश ईसाई राष्ट्रों के संविधान में सेक्युलर’ शब्द का उल्लेख नहीं है. हमारे भारत के संविधान में भी पहले सेक्युलर’ शब्द नहीं था. वह संविधान लागू होने के २६ वर्ष बाद अंतर्भूत किया गया. फिर भी प्रारंभ से ही हमारा राज्य सेक्युलर ही था. मतलब राज्य का अपना स्वयं का कोई भी संप्रदाय या रिलिजन नहीं था. सब प्रकार के पंथसंप्रदायश्रद्धाविश्‍वास मानने वालों को समान अधिकार थे. अमेरिका के संविधान में भी सेक्युलर’ शब्द नहीं है. लेकिन अमेरिका की सियासी नीति सेक्युलर’ मतलब सब पंथ-संप्रदायों को समान मानने की है. वहॉं १६ प्रतिशत कॅथॉलिक है. उनमें से कोई भी,राष्ट्रपति पद के लिए खड़ा हो सकता है. आज तक केवल एक ही कॅथॉलिक उस पद चुनकर आ सका और वह भी पूरे चार वर्ष टिक नहीं सकायह बात अलग है. लेकिन कॅथॉलिकों पर वैसे कोई बंदी नहीं है. अनेक भारतीय मूल के लेकिन अमेरिका में जन्मे और वहीं की नागरिकता प्राप्त करने वाले लोग शासकीय पदों पर चुनकर आए हैं. आज के अमेरिका के राष्ट्रपति का मूल कुल फ्रीका का है. इंग्लंड में भीइंग्लंड का अधिकृत चर्च होने और राजा कोडिफेंडर ऑफ् द फेथ’ मतलब उस पंथ का संरक्षक किताब होने के बावजूदवहॉं भी गैर ईसाईयों कोनागरिकता मिलती है और वे चुनाव भी लड़ सकते हैं.
इस सेक्युलर व्यवस्था के कारण पोप महाशय को चिंता होने का क्या कारण हैकॅथॉलिक चर्च कामतलब उस संप्रदाय काउपासना काकर्मकांड का क्षेत्र अलग है. सरकार उसमें अड़ंगा न डालेइतना काफी है. लेकिनशायद इतने से पोप महोदय संतुष्ट नहीं है. कारणइतिहास में ईसाई धर्म के प्रसार में शासकों का बहुत बड़ा योगदान मिला है. रोमन सम्राटों ने ईसाई धर्म स्वीकार नहीं किया होता और उसके प्रसार के लिए अपनी राज्यशक्ति का प्रयोग नहीं किया होतातो ईसाई धर्म का इतना प्रसार हो ही नहीं पाता. इस कारण सेक्युलरिझम्’ से पोप महाशय का चिंतित होना स्वाभाविक ही है. लेकिन भविष्य में ईसाई धर्म को मानने वाले शासक - फिर वे किसी भी पंथ के होअपने राज्य की शक्ति का प्रयोग धर्मप्रसार के लिए करेंगेऐसी संभावना नहीं है. ऐसा भी एक समय था, जब ईसाई साम्राज्यवादी देशईसाई धर्म के प्रसार के लिए अलग-अलग चर्च को भरपूर धन देते थे. उद्देश्य यह किउन देशों मेंउनके साम्राज्य से एकनिष्ठ रहने वाले स्थानीय लोगों की संख्या में वृद्धि हो. आज भीवे मिशनरी संस्थाओं को धन की मदद करते ही होगे. लेकिन खुलकर नहीं. इसलिए पोप महाशयऔर उनके सहयोगीईसाई सरकारे उन्हें मदद करेंगे इस भरोसे न रहे तो ठीक होगा. आवश्यकता इस बात की भी है कि ईसाई धर्मोपदेशक सेक्युलॅरिझम् का सही अर्थ अपने लोगों को समझाए और राज्य शासन कोधर्म के क्षेत्र में हस्तक्षेप न करेंऐसी चेतावनी दे. धर्म-संप्रदाय का प्रचार-प्रसार धर्मसंस्थाओं ने अपने बल पर ही करना चाहिए और वह भी जनता को अपने धर्म के तत्त्व और समयानुसार उनका औचित्य समझाकर.

इस्लाम का खतरा
दूसरा सही में खतरा है इस्लाम का. वह केवल ईसाई चर्च को ही नहींईसाई राज्यों को भी हो सकता है. कारण इस्लाम के अनुयायी आक्रमक होते है. आज वे आपसी झगड़ों में ही उलझे है लेकिनवहॉं भी मूलतत्त्ववादी (फंडामेंटालिस्ट) मुसलमान ही भारी पड़ रहे है. मुसलमान अपनी जनसंख्या बढ़ाने में भी पारंगत है. प्रो. सॅम्युएल हंटिंग्डन ने भी अपने क्लॅश ऑफ सिव्हिलायझेशन्स’ इस प्रसिद्ध पुस्तक में ईसाई और मुस्लिम राष्ट्रों के बीच संघर्ष की संभावना व्यक्त की है. यह संघर्षइन दो धर्मों के आधारभूत तत्त्वों के कारण अटल दिखता हैऐसा उसका कहना है. (देखें पृष्ठ २०९ से २१८) मुझे ऐसी जानकारी मिली है किइस सायनडमें ईसाई धर्म को इस्लाम के आक्रमक अनुयायियों की ओर से होने वाले संभावित खतरे की विस्तार से चर्चा हुई है.
इसलिए रोमन कॅथॉलिक चर्च ने इस्लाम का प्रसार रोकने के लिए अपनी शक्ति खर्च करनी चाहिए. विद्यमान पोप महाशय के पूर्वाधिकारी इस शताब्दी के प्रारंभ में भारत में भी आये थे और उन्होंने यह सहस्रकएशिया महाद्वीप को ईसाई बनाने के लिए निश्‍चित करेंऐसी घोषणा की थी. एशिया महाद्वीप में वे किसे ईसाई बना सकेंगेकेवल हिंदू और बौद्धों को ही! मुसलमानों को हाथ लगाना तो दूर की बात हैउनकी बस्ती में पादरी घूस भी नहीं सकेंगे. पोप महाशय ने अपने भाषण में चर्च के बायबल पर की श्रद्धा बढ़ाने के कार्य को पुन: उत्साह संपन्न करने की  (Reinvigorate the Church's Evengelisation Mission) जो आवश्यकता प्रतिपादित की हैउसके बारे में विवाद का कारण ही नहीं. लेकिन इस उत्साह की दिशा (१) स्वयं को ईसाई मानने वाले और येशु को माननेवाले लोगों में बायबलयेशु और चर्च के बारे में आस्था निर्माण करने की दिशा में होनी चाहिएऔर (२) इस्लाम का जो इतिहाससिद्ध आक्रमक और विस्तारवादी स्वभाव हैउससे ईसाई जनता को कैसे बचाए इस ओर में होनी चाहिए.

चर्च के नवोत्साह की दिशा
ऐसी जानकारी है किअब हर महाद्वीप में ईसाई धर्माचार्यों की सभाए होगी. एशिया महाद्वीप के धर्माचार्यों की सभा आगामी नवंबर के पहले सप्ताह में आयोजित है. उस सभा की दिशा इन दो बातों की ओर ही होनी चाहिए. निरुपद्रवीआत्मसंतुष्ट हिंदू-बौद्धों की और उस उत्साह की दिशा रहने का कारण नहीं. ईसाई राष्ट्रों को उनकी ओर से कतई खतरा नहीं. खतरा कट्टर मुस्लिम राष्ट्रों से ही हो सकता हैऔर यदि तीसरा महायुद्ध हुआ तो वह इन दो धर्मों या सभ्यताओं के अनुयायियों में ही होगायह सब लोग पक्का ध्यान में रखें. प्रो. हंटिंग्डन ने भी अपने पुस्तक में यहीं भविष्य व्यक्त किया है. रोमन कॅथॉलिक चर्च ने अपनी सारी शक्ति इसी दिशा में लगानी चाहिए.

Sunday, December 2, 2012

मर जाएँगे पर घर नहीं जाएँगे-




16 Nov 2012 07:00,
2012-11-16T16:22:58+05:30 नारायण बारेठ जयपुर से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए खिम्मी भील और उनके साथ आये अन्य हिंदू किसी कीमत पार पाकिस्तान वापस जाने के लिए तैयार नहीं खिम्मी भील ने तीन महीने पहले  पाकिस्तान से आते वक़्त वचन दिया था कि वो तीर्थ यात्रा पूरी कर के वापस लौटेंगी लेकिन अब वह भारत में ही रहेगी. राजस्थान की सरकार ने पाकिस्तान से आए 285पाकिस्तानी हिंदुओं को लंबी अवधि का वीजा देने की सिफ़ारिश की है. अगर उन्हें वीजा मिल गया तो ये हिंदू बेरोक-टोक सात सालों तक भारत में रह सकते हैं और उसके बाद नागरिकता के लिए आवेदन दे सकते हैं. ये लोग धर्म स्थलों की यात्रा के लिए जत्था लेकर पाकिस्तान से भारत आए थे और फिर धर्म के आधार पर पाकिस्तान में उत्पीड़न और पक्षपात का हवाला देकर वापस लौटने से इनकार कर दिया. ये हिंदू पिछले तीन माह में अलग-अलग ऐसे समय भारत में दाखिल हुए जब पाकिस्तान सरकार ने पहले हिंदू अल्पसंख्यको को कथित रूप से भारत जाने से रोका और फिर भारी हंगामे के बाद अनुमति दी.
 जेल भेजो रेल नहीं -
 इन हिंदुओ के मुताबिकइनसे यह करार लिया गया है कि वो भारत में नहीं रुकेंगे और अपनी धार्मिक यात्रा पूरी होते हीवीज़ा में दी गई मियाद के भीतर ही पाकिस्तान लौट आएँगें. लेकिन इनमें से हर हिंदू का कहना था कि चाहे जेल भेज दो लेकिन पाकिस्तान के लिए रेल में मत भेजो. पाकिस्तान से आए इन हिंदुओं के लिए काम करने वाले सीमांत लोक संगठन के अध्यक्ष सोढ़ा कहते है जो भी हिंदू आए हैवे संगठन के अस्थायी कैंप में पनाह लिए हुए है. सोढ़ा का कहना है, "पाकिस्तान में जैसे हालात हैअभी हिंदू अल्पसंख्यको का आना जारी रहेगाहम चाहते है कि भारत सरकार तुरंत ऐसे हिंदुओ के लिएशिविर स्थापित करे. इससे पहले भी जब 1971 और 1965 के भारत-पाक जंग में हिंदुओ ने भारत में शरण ली तो सरकार ने उनके लिए कैंप स्थापित किये थे. ताज्जुब है इस बार भारत ने ऐसा कुछ नहीं किया"संगठन के मुताबिक अब तक पाकिस्तान से भील या दलित बिरादरी के लोग ही पलायन कर भारत आ रहे थे. लेकिन अब छोटे-छोटे अन्य हिंदू जाति समूह के लोग भी भारत आने लगे है. कोई डेढ़ माह पहले पाकिस्तान से रेबारी चरवाह बिरादरी के 24 लोग भारत चले आए. साल 2004 में तेरह हजार पाकिस्तानी हिंदुओ ने भारत की नागरिकता हासिल की और अभी सात हजार और भी भारत की नागरिकता के लिए क़तार में खड़े है. कानाराम भील पहले पाकिस्तान के पंजाब सूबे में रहीमयार खान जिले में रहते थे. अब वो सदा के लिए अपने घर वतन को छोड़ आए हैं. कानाराम कहते है, "अपना घर छोड़ना आसान नहीं होता. हम वहां जिल्लत की जिंदगी जी रहे थेहमारे बच्चे स्कूल नहीं जा सकते थे. हमेशा खौफ़ का साया घेरे रहता था. औरतें घरों में कैद होकर रह जाती थीऐसे माहौल में अब ज्यादा रहना मुश्किल थालिहाजा मौका मिलते ही भारत चले आए.इन हिंदुओं के मुताबिक भारत उनके आगमन को निरुत्साहित कर रहा है. चेतन भील कहते हैं, "हमें उम्मीद थी कि वीज़ा नियमों को थोड़ा सरल किया जाएगा. किंतु जिस तरह वीज़ा नियमो में नयी शर्ते जोड़ी गई हैउससे साफ़ है भारत पाकिस्तान से आने वाले हिंदुओं के आगमन को निरुत्साहित कर रहा है. सोढ़ा बताते हैं, "ज्यादा लोग विजिटर वीज़ा पर भारत आते थेलेकिन उसकी शर्तों को कठोर बना दिया गया. सो अब लोग धार्मिक वीज़ा पर भारत का रुख करने लगे है.महंगी नागरिकता राजस्थान में सरकार ने पाकिस्तान से आये उन हिंदुओं के लिए नागरिकता की प्रक्रिया शुरू की है जो लगातार सात साल से भारत में रह रहे है. पर इन हिंदुओ के अनुसार नागरिकता की फ़ीस इंतनी ज्यादा है कि अधिकांश पाकिस्तानी हिंदुओ के लिए आवेदन करना ही मुश्किल होगा. एक प्रेमचंद भील 2005में पाकिस्तान के सूबा सिंध से भारत आए. लेकिन नागरिकता अब तक नहीं मिली है. वो कहते है उनके परिवार में 15 लोग है. उन्होंने बताया''हमें भारत की नागरिकता नहीं मिली है. नागरिकता के लिए फीस बूते से बाहर हैइसमें छह श्रेणियाँ है और फीस पांच हजार से लेकर पचीस हजार तक हैअब क्या एक लुटे-पिटे खेतिहर मजदूर के लिए इतने रूपए जुटाना संभव है." उधर पाकिस्तान इन आरोपों से इनकार रहता रहा है कि उसके यहाँ हिंदूअल्पसंख्यकों साथ कोई भेदभाव किया जाता है. लेकिन इन हिंदुओ का आना अब भी जारी है.

Saturday, December 1, 2012

११ नवंबर के भाष्य से मची खलबली



११ नवंबर को मैंने भाजपा की अ-स्वस्थता’ शीर्षक का भाष्य लिखा. वह मराठी में था. उसके प्रकाशित होते ही खूब खलबली मची. १२ नवंबर कोकहीं उसका समाचार आया होगा. इस कारणसब प्रसारमाध्यम खूब सक्रिय हुए. सब को लगा किएक मसालेदार समाचार मिला है. दि. १२ को हीनागपुर में,मेरे घर छ:-सात टीव्ही चॅनेल के प्रतिनिधि आये. मैंने उन सब को एक साथ आने के लिए कहा.

मेरा निवेदन
मैंने उन्हें बताये निवेदन का सार यह था कि,
(१) यह मेरा व्यक्तिगत मत है. राम जेठमलानी को जैसे उनका मत व्यक्त करने का अधिकार हैवैसे मुझे भी है.
(२) मेरे इस मत का संघ से कोई संबंध नहीं. गत नौ वर्षों से मेरे पास संघ का कोई पद नहीं. इतना ही नहींगत चार-पॉंच वर्षों से अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठकों में मैं अधिकृत निमंत्रित भी नहीं. इसके अलावाऐसे मामलों की संघ में चर्चा नहीं होतीयह मेरा अनुभव है.  
(३) मेरा लक्ष्य जेठमलानी थे. उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीन गडकरी के त्यागपत्र की मॉंग कर उसी वक्तव्य में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार करें ऐसा कहने के कारणगडकरी के विरुद्ध के अभियान की सुई (अंगुली) गुजरात की ओर मुडती हैऐसा मैंने कहा. उसी प्रकार राम जेठमलानी के पुत्र महेश जेठमलानी ने नीतीन गडकरी को कलंकित (टेण्टेड) संबोधित कर भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्यता का त्यागपत्र देने का पत्रक प्रसिद्ध करने के कारणइसके पीछे कुछ षडयंत्र होगाऐसा भी मुझे लगा.  
(४) २०१४ के लोकसभा के चुनाव में भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन होगाइसकी आज चर्चा करना मुझे अकालिक और अप्रस्तुत लगता है.

संवाददाताओं की करामात
उसके बादउस दिनदिन भर अनेक चॅनेल ने यह समाचार अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रसारित किया. इन चॅनेल के जो प्रतिनिधि आये थेउनमें अधिकांश हिंदी भाषी थे. उन्होंने मेरे ब्लॉग पर का मराठी लेख पढ़ा होने की संभावना ही नहीं थी. मेरे भाष्य’ के हिंदी अनुवाद की नागपुर में ही व्यवस्था हैवह लेख ग्वालियर से प्रकाशित होने वाले स्वदेश’ दैनिक में प्रकाशित होता है. चॅनेल के प्रतिनिधि जाने के बाद उस मराठी लेख का हिंदी अनुवाद हुआ या नहींइसकी जानकारी लेने परअनुवाद हुआ है लेकिन भेजा नहीं ऐसा मुझे बताया गया. अनुवाद में त्रुटि न रहें इसलिए मैंने उसे जॉंचा और फिरस्वदेशको भेजा तथा ब्लॉग पर भी डाला. यह सब बताने का कारण यह किमेरे घर आये किसी भी चॅनेल के प्रतिनिधि ने समग्र भाष्य’ पढ़ा नहीं था. उन्होंने अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उसे भडकाऊ रूप (सेन्सेशनॅलिझम्) देकर प्रकाशित करना, हमने स्वाभाविक ही मानना चाहिए. समाचारपत्रों के संवाददाता किसी घटना को कैसे विचित्र मोड दे सकते हैइसका एक एकदम सही उदारहण मैंने पढ़ा है.

सही उदाहरण
वह एक कॅथॉलिक धर्मगुरु की (कार्डिनल) कहानी है. वे समाचारपत्रों के प्रतिनिधियों को अपने पास भी फटकने नहीं देते थे. वे न्यूयॉर्क आये उस समय हवाईअड्डे पर ही न्यूयॉर्क टाईम्स’ के संवाददाता ने उनसे भेट की. उन्हेंचर्च केगर्भपात विरोध की नीति से लेकर अनेक विषयों पर प्रश्‍न पूछेलेकिन धर्मगुरु ने एक भी प्रश्‍न का उत्तर नहीं दिया. आखिर उस संवाददाता ने पूछा, ‘‘न्यूयार्क के मुकाम में आप नाईट क्लब को भेट देंगे?’’ इस पर धर्मगुरु ने पूछा,‘‘न्यूयार्क में नाईट क्लब है?’’ संवाददाता की खूब फजिहत की इस आनंद में वे चले गये. दूसरे दिन न्यूयार्क टाईम्स’ में समाचार प्रकाशित हुआ. ‘‘फलाने धर्मगुरु न्यूयॉर्क आये. आते ही उन्होंने जानकारी ली किक्या न्यूयॉर्क में नाईट क्लब है?’’

समाचार इतना तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है. दि. १२ को करीब सब चॅनेल ने वैद्य विरुद्ध मोदी ऐसा चित्र निर्माण किया. मैंने संदेह की सुई’ इतना ही कहा था. उन्होंने वह मेरा आरोप’ हैऐसा आभास निर्माण किया.

दो स्पष्टीकरण
स्वाभाविक ही इस पर काफी संख्या में प्रतिक्रियाए आई. जो प्रतिक्रियाए दूरध्वनि से आई उन्हें मैंने संपूर्ण भाष्य’ पढ़ने के लिए कहा. एक दिलचस्प बात ध्यान में आई किभाजपा के समर्थकों की और कुछ पदाधिकारियों की जो प्रतिक्रियाए आईउससे ऐसा लगा कि उन्हें इस भाष्य के कारण क्रोध नहीं आया. विपरीत ठीक ही लगा होगा. लेकिनसंघ स्वयंसेवकों की जो प्रतिक्रियाए आईवे मिश्रित थी और उनकी मानसिक अस्वस्थता दर्शाने वाली थी. संघ की ओर से अधिकृत रूप में बताया गया कि, ‘‘यह वैद्य जी का व्यक्तिगत मत है. संघ उससे सहमत नहीं.’’ भाजपा के ज्येष्ठ प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने भी नि:संदिग्ध रूप में बताया कि, ‘‘वह वैद्य जी का व्यक्तिगत मत है. भाजपा में फूट नहीं. पूरी भाजपा और सब मुख्यमंत्री एकजूट है.’’ यह अच्छी बात है. यह सच है कि भाजपा में फूट है ऐसा मुझे लगा. ऐसा लगना और दिखना मुझे जचा नहींइसलिए ही मैंने वह भाष्य’ लिखा. उस भाष्य का अंत इस प्रकार है :‘‘वह (भाजपा) एकजूट हैवह एकरस हैउसके नेताओं के बीच परस्पर सद्भाव हैउनके बीच मत्सर नहींऐसा चित्र निर्माण होना चाहिएऐसी भाजपा के असंख्य कार्यकर्ताओं की और सहानुभूतिधारकों की भी अपेक्षा है. इसमें ही पार्टी की भलाई हैऔर उसके वर्धिष्णुता का भरोसा भी है.’’

दो अच्छी घटनाए
मुझे आनंद है किपार्टी एकजूट होकर गडकरी के समर्थन में खड़ी हुई. गडकरी के विरुद्ध भ्रष्टाचार और अनियमितता के जो आरोप हैउन आरोपों की सरकार की ओर से जॉंच चल रही है. सरकार भाजपा की नहीं हैकॉंग्रेस की है. इस कारणगडकरी के हित में पक्षपात होने की कोई संभावना नहीं. इसलिएमैंने आग्रह से प्रतिपादित किया है और अब भी करता हूँ किसरकार की जॉंच के निष्कर्ष सामने आने दे और बाद में गडकरी के बारे में निर्णय ले. इन दो दिनों में दो अच्छी घटनाए घटित हुई. पहली यह किविख्यात चार्टर्ड अकाऊंटंट एस. गुरुमूर्ति ने गडकरी के कंपनी के कागजपत्रों की जॉंच की. उसमें उन्हें गडकरी का दोष दिखाई नहीं दिया. तथापि उन्होंने यह भी कहा है किमैंने गडकरी को क्लीन चिट’ नहीं दी. इसका क्या अर्थ ले यह वे ही जाने और दूसरी यह किगडकरी गुजरात में चुनाव के प्रचार के लिए जा रहे है. इस घटना से मोदी ने स्वयं को जेठमलानी पिता-पुत्र के अभिप्राय से दूर कियायह स्पष्ट होता है. यह अच्छा हुआ.

प्रतिक्रियाओं की विविधता
मेरे ई-मेल पर करीब १६ प्रतिक्रियाए आयी. इसके अलावा चार-पॉंच दूरध्वनि पर आयी. पांढरकवडा (जि. यवतमालमहाराष्ट्र) से कट्टर भाजपा’ कार्यकर्ता ने दूरध्वनि पर कहा, ‘‘आपने हमारे मन की बात कही.’’ हरयाणा की भाजपा के एक जिला समिति के अध्यक्ष ने दूरध्वनि पर मेरा अभिनंदन कियातो सिमला से हिमालय परिवार’ के एक ज्येष्ठ कार्यकर्ता ने कहा, ‘‘आपने बहुत अच्छा लेख लिखा.’’ दिल्ली भाजपा के एक ज्येष्ठ नेताजो आज भी भाजपा में उच्च पद पर हैउन्होंने हिंदी ब्लॉग पढ़कर मुझे बताया कि, ‘‘आपने बिल्कुल निरपेक्ष भावना से लिखा है.’’ इसके विपरीत नागपुर के एक स्वयंसेवक ने कहा कि, ‘‘स्वयंसेवक के रूप में आप अनुत्तीर्ण (नापास) हुए है. आप महामूर्ख है. आपने सब स्वयंसेवकों का अपमान किया है.’’ मैंने पूछाक्या आपने ब्लॉग पढ़ा हैउन्होंने कहा मुझे उसकी आवश्यकता नहींऔर दूरध्वनि रख दिया.

ई-मेल पर मिली प्रतिक्रियाओं में भी ऐसी ही संमिश्रता है. कोचीन (केरल) से एक स्वयंसेवक की प्रतिक्रिया अनवसरे यत् कथितम्’ मतलब अयोग्य समय किया कथनइस शीर्षक से है. गुरुमूर्ति के रिपोर्ट की प्रशंसा कर यह स्वयंसेवक कहता है कि, ‘‘आपके कथन के कारणअपना कहना लोगों तक पहुँचाने का मौका गडकरी के हाथ से निकल गया है.’’ लखनऊ के एक लेखक कहते है कि, ‘‘वैद्य जी ने संघ और भाजपा को आत्मचिंतन का मौका दिया है. संघ और भाजपा में श्रेष्ठ क्या हैतत्त्वनिष्ठा या व्यक्तिनिष्ठा?’’ तीसरी प्रतिक्रिया कहती है, ‘‘यह सच है कि शरारत तो जेठमलानी ने की. लेकिन मा. गो. ने भी मोदी के साथ उसका संबंध जोडकर एक अनचाहा मुद्दा निर्माण किया है. जेठमलानी की उपेक्षा करना ही योग्य होता.’’ एक ने तो कमाल ही कर दी. वह कहता है कि, ‘‘गडकरी की निंदा के पीछे मोदी नहींजेटली है. उन्होंने ने ही प्रशांत भूषण को गडकरी के विरुद्ध का साहित्य दिया.’’ और एक ने पूछा है, ‘‘जेठमलानी अपना मत पार्टी की सभा में रखेऐसा आप बताते हैफिर आप आपका मत परिवार की बैठक में क्यों नहीं रखते?’’ एक महिला का अभिप्राय है, ‘‘संघ की प्रतिमा को ठेस लगने जैसा मत सार्वजनिक रूप से व्यक्त करना अयोग्य है.’’ और एक प्रतिक्रिया है, ‘‘भाजपा के सैकड़ों समर्थकों का मत ही आपने प्रस्तुत किया है. भाजपा कॉंग्रेस से अलग दिखनी चाहिए.’’ नागपुर के एक मुस्लिम कार्यकर्ता कहते है, ‘‘मोदी आज भाजपा से बड़े हो गए है. यह सूर्यप्रकाश के समान स्पष्ट है.’’ उन्होंने भाजपा के अनेक नेताओं के नाम लेकर पूछा है कि, ‘‘इन नेताओं ने क्या दिये जलाएमोदी ही भाजपा को विजय दिलाएगे.’’ एक पूछता है, ‘‘सबूत न होते हुए भी भाजपा के विरुद्ध शोर मचाने की ताक में बैठे मीडिया वालों को मुद्दे देना कितना उचित है?’’ एक प्रतिक्रिया कहती है कि, ‘‘मोदी का कोई विकल्प नहीं. भाजपा के अन्य सब नेता (उन्होंने कुछ नाम लिए है) उनसे बौने है. इसलिये वे हम प्रधानमंत्री की दौड़ में नहींऐसा बताते है.’’ एक ने सूचना की है कि, ‘‘श्रीमती इंदिरा गांधी की तरह मोदी नई पार्टी निकाले.’’ और एक ने कहा है. ‘‘ॠषिसत्ता भाजपा को सही रास्ते पर लाए.’’ अन्य दो नेब्लॉग पढ़कर ‘‘वह हमारी भावना प्रकट करता है,’’ ऐसा कहातो एक ने प्रश्‍न किया कि, ‘‘यह लेख लिखने के लिए कॉंग्रेस ने तुम्हें कितने पैसे दिये?’’

अकालिक चर्चा
कितने प्रकार की प्रतिक्रियाए हो सकती हैइसका यह निदर्शक है. इससे एक गलतफहमी प्रकट होती है किमैं नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध हूँ. यह गलतफहमी प्रकट होने का एक कारणइन लोगों ने यह भाष्य’ अच्छी तरह से नहीं पढ़ा होगायह हो सकता है. मेरे भाष्य की सुई जेठमलानी की ओर है. करीब आठ दिनों से वे खामोश हैयह अच्छा ही है. मेरा मोदी या उनकी प्रधानमंत्री बनाने की महत्त्वाकांक्षा को विरोध होने का कोई कारण ही नहीं. मैं उस स्पर्धा में प्रतिस्पर्धी नहीं हूँ. लेकिन यह सच है किइस पद के संभाव्य व्यक्ति की चर्चा आज करना मुझे अप्रस्तुत लगता है. श्री बाळासाहब ठाकरे ने सुषमा स्वराज को प्रधानमंत्री बनाएऐसा कहा था. तब भी मैंने यही कहा था. २०१४ में होने वाले होने वाले प्रधानमंत्री की चर्चा इस समय अकालिक हैऐसा मेरा दृढ मत है. हमारा नेता कौन यह चुनकर आये लोकसभा के सदस्य तय करेंगे.

लोकसत्ता’ का संपादकीय
मेरे इस भाष्य’ पर मराठी दैनिक लोकसत्ता’ ने (एक्स्प्रेस ग्रुपएक विस्तृत संपादकीय लिखा है. उसका शीर्षक है वैद्य की कसाई’ (वैद्य या कसाई). इस संपादकीय के प्रकाशन के बाद लोकसत्ता’ कार्यालय से मुझे दूरध्वनि आया और पूछा कि, ‘‘इस संपादकीय के बारे में आपका मत क्या है?’’ संपादकीय के लेखक गिरीश कुबेर (व्यवस्थापकीय संपादकहैयह भी उन्होंने मुझे बताया. संपूर्ण लेख पढ़ने के बाद मुझे मज़ा आया. मैं अखबार व्यवसाय में था. मैं संपादक था उस समय कम से कम दो मोर्चे वैद्य मुर्दाबाद’ के नारे लगाते तरुण भारत कार्यालय पर आये थे. खून की धमकी के दो बेनामी पत्र भी मिले थे. तब भी मैंने उसे गंभीरता से नहीं लिया था. मैंने वह पत्र पुलीस को नहीं दिए. एक ने स्वयंसेवक ऐसी पहचान बताकर मुझे अनुत्तीर्ण’ और महामूर्ख’ कहा,उस तुलना में गिरीश कुबेर का लेख बहुत ही सौम्य है. मैं मुख्य संपादक था तबवाचकों का पत्रव्यवहार प्रकाशित करते समयतरुण भारत’ के संपादकीय पर आक्षेप लेने वालेउसके प्रतिपादन का विरोध करने वाले और अलग मत व्यक्त करने वाले पत्र प्राथम्य क्रम से प्रकाशित करेऐसा स्पष्ट निर्देश मैंने दिया था. उन पत्रों के अशिष्ट शब्दकभी-कभी गालीयुक्त शब्दवैसे ही कायम रखेऐसा मेरा आग्रह होता था. इस बारे में संबंधित सहायक संपादक ने प्रश्‍न कियातब मैंने कहा था, ‘‘वह शब्द रहने दो. उससे पत्रलेखक का बौद्धिक और सांस्कृतिक स्तर स्पष्ट होता है.’’

उपमान का चयन
इसलिए गिरीश कुबेर के लेख से मैं क्रोधित नहीं हुआ. मुझे कसाई’ कहाक्या यह सही नहीं हैकसाई भी चाकू चलाता है और वैद्य भी (मतलब शस्त्रक्रिया करने वाला डॉक्टर ऐसा मैं मानता हूँ) रुग्ण के पेट पर या अन्य दोषयुक्त इंद्रियों पर चाकू चलाता है. दोनों स्थानों पर चाकू का उपयोग होने के कारण वैद्य और कसाई की तुलना करने का मोह होना असंभाव्य नहीं. लेकिन वैद्य का चाकू रुग्ण के प्राण बचाने के लिए होता हैतो कसाई का प्राण लेने के लिए होता हैयह अंतर जोशपूर्ण मानसिक अवस्था में ध्यान में नहीं लिया गया होगातो क्या वह भी स्वाभाविक नहींकौन किस उपमान का प्रयोग करे यह तो प्रयोग करने वाले के बौद्धिक एवं सांस्कृतिक संस्कार पर ही निर्भर होगाकुबेर ने मुझे लेखन रोकने की सलाह दी हैउस पर मैं अवश्य विचार करूंगा. लेकिन एक बात स्पष्ट करना आवश्यक समझता हूँ. ब्लॉग’ आदि की मुझे जानकारी ही नहीं थी. कोलकाता से प्रसिद्ध होने वाले टेलिग्राफ के इस क्षेत्र के प्रतिनिधि ने भाष्य’ पढ़ने नहीं मिलने की शिकायत की और उन्होंने ही ब्लॉग शुरु करने के लिए कहा. मेरा एक लड़का ई-न्यूज भारती में काम करता है. उसे इस तकनीक की जानकारी है. उसने ब्लॉग पर भाष्य’ डालना शुरु किया. लेकिन इससे पहले भी भाष्य औरंगाबाद और सोलापुर से प्रकाशित होने वाले तरुण भारत में प्रकाशित होता थाऔर आज भी होता है. उसका हिंदी अनुवाद ग्वालियर से प्रकाशित होने वाले स्वदेश’ में आता है. मैंने तो भाष्यलिखना बंद ही किया था. लेकिन इन तीनों की ओर से बिनति किए जाने पर फिर लेखन शुरु किया. कुबेर जी देवगिरी तरुण भारत के भूतपूर्व संपादक दिलीप धारूरकर से वस्तुस्थिति जान ले सकते है. उन्हें लेख पसंद नहीं होगातो वे न पढ़े. उनके नागपुर कार्यालय को भी मुझे लेख न मॉंगने की सूचना दे.

इस लेख की एक बात मुझे अखरी. वह यह किसंघ की प्रचारक व्यवस्था के बारे में कुबेर इतना अज्ञान कैसे प्रदर्शित करते है. मैं प्रवक्ता था उस समयप्रचारक’ मतलब क्या, यह विदेशी पत्रकारों को समझाना मेरे लिए कठिन साबित होता था. कुबेर तो इस देश और महाराष्ट्र के ही है. क्या उन्हें यह पता नहीं किप्रचारक वंशपरंपरा से नहीं आता. उसने स्वीकार किये जीवनव्रत से हीवह, ‘प्रचारक’ श्रेणी में दाखिल होने के लिए पात्र बनता है. एक मजेदार बात बताता हूँ. मेरे बाद २००३ में राम माधव संघ के प्रवक्ता बने थे. एक सज्जन ने मुझसे कहा, ‘आपका जो लड़का प्रवक्ता बना है वह भी अच्छे उत्तर देता है.’ मैंने उत्तर दिया, ‘अच्छे उत्तर देता है न! लेकिन वह मेरा लड़का नहीं है.’ उन सज्जन की गलतफहमी होना स्वाभाविक था. कारण मेरे एक लड़के का नाम राम’ हैऔर मैं माधव. वह राम माधव हुआ की नहीं! यह रामसांप्रत इंग्लैंड में प्रचारक है. मतलब वहॉं उसका मुख्यालय है. प्रचारक का कार्यक्षेत्र,स्थान और पद उसके पिता निश्‍चित नहीं करते. लेकिन गिरीश कुबेर जोश में आए है. मैं जानबुझकर नशे में’ नहीं कहता. ऐसा लगता है कि उन्होंने संघ-भाजपा के बीच की उलझन समाप्त करने की ठानी है. लेकिन इसके लिए क्या उचित और क्या अनुचित इसका विवेक रखे. जोश में आकर इस प्रकार विवेक खोना उचित नहीं. तथापि मैं उन्हें दोष नहीं देता. अधूरी जानकारी रही तो ऐसे दोष होना स्वाभाविक ही कहा जाना चाहिए. मैंने निश्‍चित किया है कि मेरे लिए अब यह विषय यहीं समाप्त हुआ है.

Norway Violating Human Rights of Indians while Indian Govt gives hollow promises Says Dr Pravin Togadia




New Delhi, December 1, 2012
After taking 2 Indian kids of tender age 3 & 4 into unlawful custody snatching them from their parents earlier this year, now the Norway police have arrested another Indian couple for what the police term as ‘Maltreatment to children’. Chandrasekhar Vallabhaneni, a Software Engineer from Andhra Pradesh & father of a 7 year old boy & the boy’s mother – an employee in the Indian Embassy in Oslo have been unlawfully detained by Norway police because they told the boy that they would sent him back to India for wetting his pants in school bus. 
Reacting strongly on it, VHP International Working President Dr Pravin Togadia said, “This is a classic case of purposeful & motivated maltreatment by Norway Govt to Hindus. Rather than arresting the parents, the Norway police should have arrested the school authorities / school bus managers for creating the situation of fear where the child did pant wetting in the bus. But Norway has been vicious to Indian Hindu parents even before. They object to feeding the child curd-rice, making the child comfortable in giving him / her parental love while sleeping & they object to anything & everything that is a normal cultural & religious practice of Hindus & even other Indians from the time even before the Norwegian systems were born. Norway themselves could not discipline their own youth in his childhood who later on went on to kill over 90 youth in their own country & they teach Indians the child care! Even in the earlier case, the Norway Govt has violated human rights of Hindu parents & also the child rights by snatching little kids & handing them over to the Christian foster homes. This is motivated human rights violation & the Govt of India must immediately act on it rather than giving fake promises. In the first case of taking away 2 kids, Indian Govt did not take stricter actions & therefore now the Norway police have become bold enough to arrest the parents for trying to discipline their kid in their traditional way. It is not just the ignorance about Indian culture; but also the purposeful insult to Hindu traditions.”
Dr Togadia further demanded:
1.      The new External Affairs Minister Salman Khursheed has termed Norway action illegal, but has not filed any legal objection in the United Nations Human Rights Commission or in the International Court against the action of Norway Govt. He should immediately get this done.
2.      Many Norwegian companies & organizations operate in Bharat & earn billions of dollars. Until both the cases on Indian parents are immediately withdrawn & the kids handed over to the parents, Govt of India should ask these companies to shut down their operations in Bharat. It has been observed time & again that the US to UK & many other nations compel Bharat to make certain policy decisions based on corporate pressure groups of their companies. It is time that Govt of India uses its diplomatic brains to force Norway to stop hurting Indians anymore.  
3.      If Norway does not release the Andhra Pradesh couple immediately withdrawing all cases against them in 48 hours, we appeal all in Bharat to peacefully & democratically boycott all Norwegian products & companies. We will peacefully demonstrate in front of Norwegian High Commission in Bharat as a beginning.
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