Sunday, December 2, 2012

मर जाएँगे पर घर नहीं जाएँगे-




16 Nov 2012 07:00,
2012-11-16T16:22:58+05:30 नारायण बारेठ जयपुर से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए खिम्मी भील और उनके साथ आये अन्य हिंदू किसी कीमत पार पाकिस्तान वापस जाने के लिए तैयार नहीं खिम्मी भील ने तीन महीने पहले  पाकिस्तान से आते वक़्त वचन दिया था कि वो तीर्थ यात्रा पूरी कर के वापस लौटेंगी लेकिन अब वह भारत में ही रहेगी. राजस्थान की सरकार ने पाकिस्तान से आए 285पाकिस्तानी हिंदुओं को लंबी अवधि का वीजा देने की सिफ़ारिश की है. अगर उन्हें वीजा मिल गया तो ये हिंदू बेरोक-टोक सात सालों तक भारत में रह सकते हैं और उसके बाद नागरिकता के लिए आवेदन दे सकते हैं. ये लोग धर्म स्थलों की यात्रा के लिए जत्था लेकर पाकिस्तान से भारत आए थे और फिर धर्म के आधार पर पाकिस्तान में उत्पीड़न और पक्षपात का हवाला देकर वापस लौटने से इनकार कर दिया. ये हिंदू पिछले तीन माह में अलग-अलग ऐसे समय भारत में दाखिल हुए जब पाकिस्तान सरकार ने पहले हिंदू अल्पसंख्यको को कथित रूप से भारत जाने से रोका और फिर भारी हंगामे के बाद अनुमति दी.
 जेल भेजो रेल नहीं -
 इन हिंदुओ के मुताबिकइनसे यह करार लिया गया है कि वो भारत में नहीं रुकेंगे और अपनी धार्मिक यात्रा पूरी होते हीवीज़ा में दी गई मियाद के भीतर ही पाकिस्तान लौट आएँगें. लेकिन इनमें से हर हिंदू का कहना था कि चाहे जेल भेज दो लेकिन पाकिस्तान के लिए रेल में मत भेजो. पाकिस्तान से आए इन हिंदुओं के लिए काम करने वाले सीमांत लोक संगठन के अध्यक्ष सोढ़ा कहते है जो भी हिंदू आए हैवे संगठन के अस्थायी कैंप में पनाह लिए हुए है. सोढ़ा का कहना है, "पाकिस्तान में जैसे हालात हैअभी हिंदू अल्पसंख्यको का आना जारी रहेगाहम चाहते है कि भारत सरकार तुरंत ऐसे हिंदुओ के लिएशिविर स्थापित करे. इससे पहले भी जब 1971 और 1965 के भारत-पाक जंग में हिंदुओ ने भारत में शरण ली तो सरकार ने उनके लिए कैंप स्थापित किये थे. ताज्जुब है इस बार भारत ने ऐसा कुछ नहीं किया"संगठन के मुताबिक अब तक पाकिस्तान से भील या दलित बिरादरी के लोग ही पलायन कर भारत आ रहे थे. लेकिन अब छोटे-छोटे अन्य हिंदू जाति समूह के लोग भी भारत आने लगे है. कोई डेढ़ माह पहले पाकिस्तान से रेबारी चरवाह बिरादरी के 24 लोग भारत चले आए. साल 2004 में तेरह हजार पाकिस्तानी हिंदुओ ने भारत की नागरिकता हासिल की और अभी सात हजार और भी भारत की नागरिकता के लिए क़तार में खड़े है. कानाराम भील पहले पाकिस्तान के पंजाब सूबे में रहीमयार खान जिले में रहते थे. अब वो सदा के लिए अपने घर वतन को छोड़ आए हैं. कानाराम कहते है, "अपना घर छोड़ना आसान नहीं होता. हम वहां जिल्लत की जिंदगी जी रहे थेहमारे बच्चे स्कूल नहीं जा सकते थे. हमेशा खौफ़ का साया घेरे रहता था. औरतें घरों में कैद होकर रह जाती थीऐसे माहौल में अब ज्यादा रहना मुश्किल थालिहाजा मौका मिलते ही भारत चले आए.इन हिंदुओं के मुताबिक भारत उनके आगमन को निरुत्साहित कर रहा है. चेतन भील कहते हैं, "हमें उम्मीद थी कि वीज़ा नियमों को थोड़ा सरल किया जाएगा. किंतु जिस तरह वीज़ा नियमो में नयी शर्ते जोड़ी गई हैउससे साफ़ है भारत पाकिस्तान से आने वाले हिंदुओं के आगमन को निरुत्साहित कर रहा है. सोढ़ा बताते हैं, "ज्यादा लोग विजिटर वीज़ा पर भारत आते थेलेकिन उसकी शर्तों को कठोर बना दिया गया. सो अब लोग धार्मिक वीज़ा पर भारत का रुख करने लगे है.महंगी नागरिकता राजस्थान में सरकार ने पाकिस्तान से आये उन हिंदुओं के लिए नागरिकता की प्रक्रिया शुरू की है जो लगातार सात साल से भारत में रह रहे है. पर इन हिंदुओ के अनुसार नागरिकता की फ़ीस इंतनी ज्यादा है कि अधिकांश पाकिस्तानी हिंदुओ के लिए आवेदन करना ही मुश्किल होगा. एक प्रेमचंद भील 2005में पाकिस्तान के सूबा सिंध से भारत आए. लेकिन नागरिकता अब तक नहीं मिली है. वो कहते है उनके परिवार में 15 लोग है. उन्होंने बताया''हमें भारत की नागरिकता नहीं मिली है. नागरिकता के लिए फीस बूते से बाहर हैइसमें छह श्रेणियाँ है और फीस पांच हजार से लेकर पचीस हजार तक हैअब क्या एक लुटे-पिटे खेतिहर मजदूर के लिए इतने रूपए जुटाना संभव है." उधर पाकिस्तान इन आरोपों से इनकार रहता रहा है कि उसके यहाँ हिंदूअल्पसंख्यकों साथ कोई भेदभाव किया जाता है. लेकिन इन हिंदुओ का आना अब भी जारी है.

Saturday, December 1, 2012

११ नवंबर के भाष्य से मची खलबली



११ नवंबर को मैंने भाजपा की अ-स्वस्थता’ शीर्षक का भाष्य लिखा. वह मराठी में था. उसके प्रकाशित होते ही खूब खलबली मची. १२ नवंबर कोकहीं उसका समाचार आया होगा. इस कारणसब प्रसारमाध्यम खूब सक्रिय हुए. सब को लगा किएक मसालेदार समाचार मिला है. दि. १२ को हीनागपुर में,मेरे घर छ:-सात टीव्ही चॅनेल के प्रतिनिधि आये. मैंने उन सब को एक साथ आने के लिए कहा.

मेरा निवेदन
मैंने उन्हें बताये निवेदन का सार यह था कि,
(१) यह मेरा व्यक्तिगत मत है. राम जेठमलानी को जैसे उनका मत व्यक्त करने का अधिकार हैवैसे मुझे भी है.
(२) मेरे इस मत का संघ से कोई संबंध नहीं. गत नौ वर्षों से मेरे पास संघ का कोई पद नहीं. इतना ही नहींगत चार-पॉंच वर्षों से अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठकों में मैं अधिकृत निमंत्रित भी नहीं. इसके अलावाऐसे मामलों की संघ में चर्चा नहीं होतीयह मेरा अनुभव है.  
(३) मेरा लक्ष्य जेठमलानी थे. उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीन गडकरी के त्यागपत्र की मॉंग कर उसी वक्तव्य में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार करें ऐसा कहने के कारणगडकरी के विरुद्ध के अभियान की सुई (अंगुली) गुजरात की ओर मुडती हैऐसा मैंने कहा. उसी प्रकार राम जेठमलानी के पुत्र महेश जेठमलानी ने नीतीन गडकरी को कलंकित (टेण्टेड) संबोधित कर भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्यता का त्यागपत्र देने का पत्रक प्रसिद्ध करने के कारणइसके पीछे कुछ षडयंत्र होगाऐसा भी मुझे लगा.  
(४) २०१४ के लोकसभा के चुनाव में भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन होगाइसकी आज चर्चा करना मुझे अकालिक और अप्रस्तुत लगता है.

संवाददाताओं की करामात
उसके बादउस दिनदिन भर अनेक चॅनेल ने यह समाचार अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रसारित किया. इन चॅनेल के जो प्रतिनिधि आये थेउनमें अधिकांश हिंदी भाषी थे. उन्होंने मेरे ब्लॉग पर का मराठी लेख पढ़ा होने की संभावना ही नहीं थी. मेरे भाष्य’ के हिंदी अनुवाद की नागपुर में ही व्यवस्था हैवह लेख ग्वालियर से प्रकाशित होने वाले स्वदेश’ दैनिक में प्रकाशित होता है. चॅनेल के प्रतिनिधि जाने के बाद उस मराठी लेख का हिंदी अनुवाद हुआ या नहींइसकी जानकारी लेने परअनुवाद हुआ है लेकिन भेजा नहीं ऐसा मुझे बताया गया. अनुवाद में त्रुटि न रहें इसलिए मैंने उसे जॉंचा और फिरस्वदेशको भेजा तथा ब्लॉग पर भी डाला. यह सब बताने का कारण यह किमेरे घर आये किसी भी चॅनेल के प्रतिनिधि ने समग्र भाष्य’ पढ़ा नहीं था. उन्होंने अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उसे भडकाऊ रूप (सेन्सेशनॅलिझम्) देकर प्रकाशित करना, हमने स्वाभाविक ही मानना चाहिए. समाचारपत्रों के संवाददाता किसी घटना को कैसे विचित्र मोड दे सकते हैइसका एक एकदम सही उदारहण मैंने पढ़ा है.

सही उदाहरण
वह एक कॅथॉलिक धर्मगुरु की (कार्डिनल) कहानी है. वे समाचारपत्रों के प्रतिनिधियों को अपने पास भी फटकने नहीं देते थे. वे न्यूयॉर्क आये उस समय हवाईअड्डे पर ही न्यूयॉर्क टाईम्स’ के संवाददाता ने उनसे भेट की. उन्हेंचर्च केगर्भपात विरोध की नीति से लेकर अनेक विषयों पर प्रश्‍न पूछेलेकिन धर्मगुरु ने एक भी प्रश्‍न का उत्तर नहीं दिया. आखिर उस संवाददाता ने पूछा, ‘‘न्यूयार्क के मुकाम में आप नाईट क्लब को भेट देंगे?’’ इस पर धर्मगुरु ने पूछा,‘‘न्यूयार्क में नाईट क्लब है?’’ संवाददाता की खूब फजिहत की इस आनंद में वे चले गये. दूसरे दिन न्यूयार्क टाईम्स’ में समाचार प्रकाशित हुआ. ‘‘फलाने धर्मगुरु न्यूयॉर्क आये. आते ही उन्होंने जानकारी ली किक्या न्यूयॉर्क में नाईट क्लब है?’’

समाचार इतना तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है. दि. १२ को करीब सब चॅनेल ने वैद्य विरुद्ध मोदी ऐसा चित्र निर्माण किया. मैंने संदेह की सुई’ इतना ही कहा था. उन्होंने वह मेरा आरोप’ हैऐसा आभास निर्माण किया.

दो स्पष्टीकरण
स्वाभाविक ही इस पर काफी संख्या में प्रतिक्रियाए आई. जो प्रतिक्रियाए दूरध्वनि से आई उन्हें मैंने संपूर्ण भाष्य’ पढ़ने के लिए कहा. एक दिलचस्प बात ध्यान में आई किभाजपा के समर्थकों की और कुछ पदाधिकारियों की जो प्रतिक्रियाए आईउससे ऐसा लगा कि उन्हें इस भाष्य के कारण क्रोध नहीं आया. विपरीत ठीक ही लगा होगा. लेकिनसंघ स्वयंसेवकों की जो प्रतिक्रियाए आईवे मिश्रित थी और उनकी मानसिक अस्वस्थता दर्शाने वाली थी. संघ की ओर से अधिकृत रूप में बताया गया कि, ‘‘यह वैद्य जी का व्यक्तिगत मत है. संघ उससे सहमत नहीं.’’ भाजपा के ज्येष्ठ प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने भी नि:संदिग्ध रूप में बताया कि, ‘‘वह वैद्य जी का व्यक्तिगत मत है. भाजपा में फूट नहीं. पूरी भाजपा और सब मुख्यमंत्री एकजूट है.’’ यह अच्छी बात है. यह सच है कि भाजपा में फूट है ऐसा मुझे लगा. ऐसा लगना और दिखना मुझे जचा नहींइसलिए ही मैंने वह भाष्य’ लिखा. उस भाष्य का अंत इस प्रकार है :‘‘वह (भाजपा) एकजूट हैवह एकरस हैउसके नेताओं के बीच परस्पर सद्भाव हैउनके बीच मत्सर नहींऐसा चित्र निर्माण होना चाहिएऐसी भाजपा के असंख्य कार्यकर्ताओं की और सहानुभूतिधारकों की भी अपेक्षा है. इसमें ही पार्टी की भलाई हैऔर उसके वर्धिष्णुता का भरोसा भी है.’’

दो अच्छी घटनाए
मुझे आनंद है किपार्टी एकजूट होकर गडकरी के समर्थन में खड़ी हुई. गडकरी के विरुद्ध भ्रष्टाचार और अनियमितता के जो आरोप हैउन आरोपों की सरकार की ओर से जॉंच चल रही है. सरकार भाजपा की नहीं हैकॉंग्रेस की है. इस कारणगडकरी के हित में पक्षपात होने की कोई संभावना नहीं. इसलिएमैंने आग्रह से प्रतिपादित किया है और अब भी करता हूँ किसरकार की जॉंच के निष्कर्ष सामने आने दे और बाद में गडकरी के बारे में निर्णय ले. इन दो दिनों में दो अच्छी घटनाए घटित हुई. पहली यह किविख्यात चार्टर्ड अकाऊंटंट एस. गुरुमूर्ति ने गडकरी के कंपनी के कागजपत्रों की जॉंच की. उसमें उन्हें गडकरी का दोष दिखाई नहीं दिया. तथापि उन्होंने यह भी कहा है किमैंने गडकरी को क्लीन चिट’ नहीं दी. इसका क्या अर्थ ले यह वे ही जाने और दूसरी यह किगडकरी गुजरात में चुनाव के प्रचार के लिए जा रहे है. इस घटना से मोदी ने स्वयं को जेठमलानी पिता-पुत्र के अभिप्राय से दूर कियायह स्पष्ट होता है. यह अच्छा हुआ.

प्रतिक्रियाओं की विविधता
मेरे ई-मेल पर करीब १६ प्रतिक्रियाए आयी. इसके अलावा चार-पॉंच दूरध्वनि पर आयी. पांढरकवडा (जि. यवतमालमहाराष्ट्र) से कट्टर भाजपा’ कार्यकर्ता ने दूरध्वनि पर कहा, ‘‘आपने हमारे मन की बात कही.’’ हरयाणा की भाजपा के एक जिला समिति के अध्यक्ष ने दूरध्वनि पर मेरा अभिनंदन कियातो सिमला से हिमालय परिवार’ के एक ज्येष्ठ कार्यकर्ता ने कहा, ‘‘आपने बहुत अच्छा लेख लिखा.’’ दिल्ली भाजपा के एक ज्येष्ठ नेताजो आज भी भाजपा में उच्च पद पर हैउन्होंने हिंदी ब्लॉग पढ़कर मुझे बताया कि, ‘‘आपने बिल्कुल निरपेक्ष भावना से लिखा है.’’ इसके विपरीत नागपुर के एक स्वयंसेवक ने कहा कि, ‘‘स्वयंसेवक के रूप में आप अनुत्तीर्ण (नापास) हुए है. आप महामूर्ख है. आपने सब स्वयंसेवकों का अपमान किया है.’’ मैंने पूछाक्या आपने ब्लॉग पढ़ा हैउन्होंने कहा मुझे उसकी आवश्यकता नहींऔर दूरध्वनि रख दिया.

ई-मेल पर मिली प्रतिक्रियाओं में भी ऐसी ही संमिश्रता है. कोचीन (केरल) से एक स्वयंसेवक की प्रतिक्रिया अनवसरे यत् कथितम्’ मतलब अयोग्य समय किया कथनइस शीर्षक से है. गुरुमूर्ति के रिपोर्ट की प्रशंसा कर यह स्वयंसेवक कहता है कि, ‘‘आपके कथन के कारणअपना कहना लोगों तक पहुँचाने का मौका गडकरी के हाथ से निकल गया है.’’ लखनऊ के एक लेखक कहते है कि, ‘‘वैद्य जी ने संघ और भाजपा को आत्मचिंतन का मौका दिया है. संघ और भाजपा में श्रेष्ठ क्या हैतत्त्वनिष्ठा या व्यक्तिनिष्ठा?’’ तीसरी प्रतिक्रिया कहती है, ‘‘यह सच है कि शरारत तो जेठमलानी ने की. लेकिन मा. गो. ने भी मोदी के साथ उसका संबंध जोडकर एक अनचाहा मुद्दा निर्माण किया है. जेठमलानी की उपेक्षा करना ही योग्य होता.’’ एक ने तो कमाल ही कर दी. वह कहता है कि, ‘‘गडकरी की निंदा के पीछे मोदी नहींजेटली है. उन्होंने ने ही प्रशांत भूषण को गडकरी के विरुद्ध का साहित्य दिया.’’ और एक ने पूछा है, ‘‘जेठमलानी अपना मत पार्टी की सभा में रखेऐसा आप बताते हैफिर आप आपका मत परिवार की बैठक में क्यों नहीं रखते?’’ एक महिला का अभिप्राय है, ‘‘संघ की प्रतिमा को ठेस लगने जैसा मत सार्वजनिक रूप से व्यक्त करना अयोग्य है.’’ और एक प्रतिक्रिया है, ‘‘भाजपा के सैकड़ों समर्थकों का मत ही आपने प्रस्तुत किया है. भाजपा कॉंग्रेस से अलग दिखनी चाहिए.’’ नागपुर के एक मुस्लिम कार्यकर्ता कहते है, ‘‘मोदी आज भाजपा से बड़े हो गए है. यह सूर्यप्रकाश के समान स्पष्ट है.’’ उन्होंने भाजपा के अनेक नेताओं के नाम लेकर पूछा है कि, ‘‘इन नेताओं ने क्या दिये जलाएमोदी ही भाजपा को विजय दिलाएगे.’’ एक पूछता है, ‘‘सबूत न होते हुए भी भाजपा के विरुद्ध शोर मचाने की ताक में बैठे मीडिया वालों को मुद्दे देना कितना उचित है?’’ एक प्रतिक्रिया कहती है कि, ‘‘मोदी का कोई विकल्प नहीं. भाजपा के अन्य सब नेता (उन्होंने कुछ नाम लिए है) उनसे बौने है. इसलिये वे हम प्रधानमंत्री की दौड़ में नहींऐसा बताते है.’’ एक ने सूचना की है कि, ‘‘श्रीमती इंदिरा गांधी की तरह मोदी नई पार्टी निकाले.’’ और एक ने कहा है. ‘‘ॠषिसत्ता भाजपा को सही रास्ते पर लाए.’’ अन्य दो नेब्लॉग पढ़कर ‘‘वह हमारी भावना प्रकट करता है,’’ ऐसा कहातो एक ने प्रश्‍न किया कि, ‘‘यह लेख लिखने के लिए कॉंग्रेस ने तुम्हें कितने पैसे दिये?’’

अकालिक चर्चा
कितने प्रकार की प्रतिक्रियाए हो सकती हैइसका यह निदर्शक है. इससे एक गलतफहमी प्रकट होती है किमैं नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध हूँ. यह गलतफहमी प्रकट होने का एक कारणइन लोगों ने यह भाष्य’ अच्छी तरह से नहीं पढ़ा होगायह हो सकता है. मेरे भाष्य की सुई जेठमलानी की ओर है. करीब आठ दिनों से वे खामोश हैयह अच्छा ही है. मेरा मोदी या उनकी प्रधानमंत्री बनाने की महत्त्वाकांक्षा को विरोध होने का कोई कारण ही नहीं. मैं उस स्पर्धा में प्रतिस्पर्धी नहीं हूँ. लेकिन यह सच है किइस पद के संभाव्य व्यक्ति की चर्चा आज करना मुझे अप्रस्तुत लगता है. श्री बाळासाहब ठाकरे ने सुषमा स्वराज को प्रधानमंत्री बनाएऐसा कहा था. तब भी मैंने यही कहा था. २०१४ में होने वाले होने वाले प्रधानमंत्री की चर्चा इस समय अकालिक हैऐसा मेरा दृढ मत है. हमारा नेता कौन यह चुनकर आये लोकसभा के सदस्य तय करेंगे.

लोकसत्ता’ का संपादकीय
मेरे इस भाष्य’ पर मराठी दैनिक लोकसत्ता’ ने (एक्स्प्रेस ग्रुपएक विस्तृत संपादकीय लिखा है. उसका शीर्षक है वैद्य की कसाई’ (वैद्य या कसाई). इस संपादकीय के प्रकाशन के बाद लोकसत्ता’ कार्यालय से मुझे दूरध्वनि आया और पूछा कि, ‘‘इस संपादकीय के बारे में आपका मत क्या है?’’ संपादकीय के लेखक गिरीश कुबेर (व्यवस्थापकीय संपादकहैयह भी उन्होंने मुझे बताया. संपूर्ण लेख पढ़ने के बाद मुझे मज़ा आया. मैं अखबार व्यवसाय में था. मैं संपादक था उस समय कम से कम दो मोर्चे वैद्य मुर्दाबाद’ के नारे लगाते तरुण भारत कार्यालय पर आये थे. खून की धमकी के दो बेनामी पत्र भी मिले थे. तब भी मैंने उसे गंभीरता से नहीं लिया था. मैंने वह पत्र पुलीस को नहीं दिए. एक ने स्वयंसेवक ऐसी पहचान बताकर मुझे अनुत्तीर्ण’ और महामूर्ख’ कहा,उस तुलना में गिरीश कुबेर का लेख बहुत ही सौम्य है. मैं मुख्य संपादक था तबवाचकों का पत्रव्यवहार प्रकाशित करते समयतरुण भारत’ के संपादकीय पर आक्षेप लेने वालेउसके प्रतिपादन का विरोध करने वाले और अलग मत व्यक्त करने वाले पत्र प्राथम्य क्रम से प्रकाशित करेऐसा स्पष्ट निर्देश मैंने दिया था. उन पत्रों के अशिष्ट शब्दकभी-कभी गालीयुक्त शब्दवैसे ही कायम रखेऐसा मेरा आग्रह होता था. इस बारे में संबंधित सहायक संपादक ने प्रश्‍न कियातब मैंने कहा था, ‘‘वह शब्द रहने दो. उससे पत्रलेखक का बौद्धिक और सांस्कृतिक स्तर स्पष्ट होता है.’’

उपमान का चयन
इसलिए गिरीश कुबेर के लेख से मैं क्रोधित नहीं हुआ. मुझे कसाई’ कहाक्या यह सही नहीं हैकसाई भी चाकू चलाता है और वैद्य भी (मतलब शस्त्रक्रिया करने वाला डॉक्टर ऐसा मैं मानता हूँ) रुग्ण के पेट पर या अन्य दोषयुक्त इंद्रियों पर चाकू चलाता है. दोनों स्थानों पर चाकू का उपयोग होने के कारण वैद्य और कसाई की तुलना करने का मोह होना असंभाव्य नहीं. लेकिन वैद्य का चाकू रुग्ण के प्राण बचाने के लिए होता हैतो कसाई का प्राण लेने के लिए होता हैयह अंतर जोशपूर्ण मानसिक अवस्था में ध्यान में नहीं लिया गया होगातो क्या वह भी स्वाभाविक नहींकौन किस उपमान का प्रयोग करे यह तो प्रयोग करने वाले के बौद्धिक एवं सांस्कृतिक संस्कार पर ही निर्भर होगाकुबेर ने मुझे लेखन रोकने की सलाह दी हैउस पर मैं अवश्य विचार करूंगा. लेकिन एक बात स्पष्ट करना आवश्यक समझता हूँ. ब्लॉग’ आदि की मुझे जानकारी ही नहीं थी. कोलकाता से प्रसिद्ध होने वाले टेलिग्राफ के इस क्षेत्र के प्रतिनिधि ने भाष्य’ पढ़ने नहीं मिलने की शिकायत की और उन्होंने ही ब्लॉग शुरु करने के लिए कहा. मेरा एक लड़का ई-न्यूज भारती में काम करता है. उसे इस तकनीक की जानकारी है. उसने ब्लॉग पर भाष्य’ डालना शुरु किया. लेकिन इससे पहले भी भाष्य औरंगाबाद और सोलापुर से प्रकाशित होने वाले तरुण भारत में प्रकाशित होता थाऔर आज भी होता है. उसका हिंदी अनुवाद ग्वालियर से प्रकाशित होने वाले स्वदेश’ में आता है. मैंने तो भाष्यलिखना बंद ही किया था. लेकिन इन तीनों की ओर से बिनति किए जाने पर फिर लेखन शुरु किया. कुबेर जी देवगिरी तरुण भारत के भूतपूर्व संपादक दिलीप धारूरकर से वस्तुस्थिति जान ले सकते है. उन्हें लेख पसंद नहीं होगातो वे न पढ़े. उनके नागपुर कार्यालय को भी मुझे लेख न मॉंगने की सूचना दे.

इस लेख की एक बात मुझे अखरी. वह यह किसंघ की प्रचारक व्यवस्था के बारे में कुबेर इतना अज्ञान कैसे प्रदर्शित करते है. मैं प्रवक्ता था उस समयप्रचारक’ मतलब क्या, यह विदेशी पत्रकारों को समझाना मेरे लिए कठिन साबित होता था. कुबेर तो इस देश और महाराष्ट्र के ही है. क्या उन्हें यह पता नहीं किप्रचारक वंशपरंपरा से नहीं आता. उसने स्वीकार किये जीवनव्रत से हीवह, ‘प्रचारक’ श्रेणी में दाखिल होने के लिए पात्र बनता है. एक मजेदार बात बताता हूँ. मेरे बाद २००३ में राम माधव संघ के प्रवक्ता बने थे. एक सज्जन ने मुझसे कहा, ‘आपका जो लड़का प्रवक्ता बना है वह भी अच्छे उत्तर देता है.’ मैंने उत्तर दिया, ‘अच्छे उत्तर देता है न! लेकिन वह मेरा लड़का नहीं है.’ उन सज्जन की गलतफहमी होना स्वाभाविक था. कारण मेरे एक लड़के का नाम राम’ हैऔर मैं माधव. वह राम माधव हुआ की नहीं! यह रामसांप्रत इंग्लैंड में प्रचारक है. मतलब वहॉं उसका मुख्यालय है. प्रचारक का कार्यक्षेत्र,स्थान और पद उसके पिता निश्‍चित नहीं करते. लेकिन गिरीश कुबेर जोश में आए है. मैं जानबुझकर नशे में’ नहीं कहता. ऐसा लगता है कि उन्होंने संघ-भाजपा के बीच की उलझन समाप्त करने की ठानी है. लेकिन इसके लिए क्या उचित और क्या अनुचित इसका विवेक रखे. जोश में आकर इस प्रकार विवेक खोना उचित नहीं. तथापि मैं उन्हें दोष नहीं देता. अधूरी जानकारी रही तो ऐसे दोष होना स्वाभाविक ही कहा जाना चाहिए. मैंने निश्‍चित किया है कि मेरे लिए अब यह विषय यहीं समाप्त हुआ है.

Norway Violating Human Rights of Indians while Indian Govt gives hollow promises Says Dr Pravin Togadia




New Delhi, December 1, 2012
After taking 2 Indian kids of tender age 3 & 4 into unlawful custody snatching them from their parents earlier this year, now the Norway police have arrested another Indian couple for what the police term as ‘Maltreatment to children’. Chandrasekhar Vallabhaneni, a Software Engineer from Andhra Pradesh & father of a 7 year old boy & the boy’s mother – an employee in the Indian Embassy in Oslo have been unlawfully detained by Norway police because they told the boy that they would sent him back to India for wetting his pants in school bus. 
Reacting strongly on it, VHP International Working President Dr Pravin Togadia said, “This is a classic case of purposeful & motivated maltreatment by Norway Govt to Hindus. Rather than arresting the parents, the Norway police should have arrested the school authorities / school bus managers for creating the situation of fear where the child did pant wetting in the bus. But Norway has been vicious to Indian Hindu parents even before. They object to feeding the child curd-rice, making the child comfortable in giving him / her parental love while sleeping & they object to anything & everything that is a normal cultural & religious practice of Hindus & even other Indians from the time even before the Norwegian systems were born. Norway themselves could not discipline their own youth in his childhood who later on went on to kill over 90 youth in their own country & they teach Indians the child care! Even in the earlier case, the Norway Govt has violated human rights of Hindu parents & also the child rights by snatching little kids & handing them over to the Christian foster homes. This is motivated human rights violation & the Govt of India must immediately act on it rather than giving fake promises. In the first case of taking away 2 kids, Indian Govt did not take stricter actions & therefore now the Norway police have become bold enough to arrest the parents for trying to discipline their kid in their traditional way. It is not just the ignorance about Indian culture; but also the purposeful insult to Hindu traditions.”
Dr Togadia further demanded:
1.      The new External Affairs Minister Salman Khursheed has termed Norway action illegal, but has not filed any legal objection in the United Nations Human Rights Commission or in the International Court against the action of Norway Govt. He should immediately get this done.
2.      Many Norwegian companies & organizations operate in Bharat & earn billions of dollars. Until both the cases on Indian parents are immediately withdrawn & the kids handed over to the parents, Govt of India should ask these companies to shut down their operations in Bharat. It has been observed time & again that the US to UK & many other nations compel Bharat to make certain policy decisions based on corporate pressure groups of their companies. It is time that Govt of India uses its diplomatic brains to force Norway to stop hurting Indians anymore.  
3.      If Norway does not release the Andhra Pradesh couple immediately withdrawing all cases against them in 48 hours, we appeal all in Bharat to peacefully & democratically boycott all Norwegian products & companies. We will peacefully demonstrate in front of Norwegian High Commission in Bharat as a beginning.
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Friday, November 30, 2012

भविष्य : शिवसेना और महाराष्ट्र की राजनीति का



शिवसेना के संस्थापक और उस संगठन के सर्वश्रेष्ठ प्रभावी नेता श्री बाळासाहब ठाकरे का १७ नवंबर को निधन हुआ. उनके कद काउनकी ताकद का और उनके समान लाखों अनुयायीयों पर धाक रखने वाला दूसरा नेता शिवसेना के पास नहींयह सर्वमान्य है. इसमें विद्यमान नेतृत्व की निंदा नही. केवल वस्तुस्थिति का निदर्शन है.

परिवारवाद
व्यक्ति केन्द्रित संगठन हो या राजनीतिक पार्टीसर्वोच्च पद पर की व्यक्ति के जाते हीऐसे प्रश्‍न निर्माण होना स्वाभाविक मानना चाहिए. इस कारण पुराने राजघरानों के समानपरिवारवाद पर चलने वाली पार्टिंयॉंजहॉं तक हो सकेविद्यमान नेता अपने सामने हीअपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति निश्‍चित कर देता है. पंजाब मेंअकाली दल के नेता मुख्यमंत्री प्रकाशसिंग बादल नेअपने पुत्र को उपमुख्यमंत्री बनाकर ऐसी ही व्यवस्था कर दी है. मुलायम सिंह ने सीधे अपने पुत्र को ही मुख्यमंत्री बना दिया. लालू प्रसाद यादव ने पत्नी को ही मुख्यमंत्री बनाया था. द्रविड मुन्नेत्र कळघम के सर्वेसर्वा करुणानिधि के दोनों पुत्र होनहार है. उनमें से एक केन्द्र सरकार में मंत्री भी है. वह करुणानिधि का ज्येष्ठ पुत्र है. लेकिन करुणानिधि का झुकावछोटे स्टॅलिन की ओर है. करुणानिधि हैतब तक सब ठीक चल भी सकता है. लेकिन उनके बाद संघर्ष अटल है. यह सब छोटे मतलब प्रादेशिक पार्टिंयों के उदाहरण है. लेकिन जो सबसे पार्टी के रूप में जानी जाती हैवह कॉंग्रेस भी परिवारवाद की ही पुरस्कर्ता है. श्रीमती इंदिरा गांधीराजीव गांधीसोनिया गांधी इस परंपरा के अनुसारअब राहुल गांधी का अनौपचारिक ही सहीराज्यारोहण-विधि हो चुका है और देश भर के कॉंग्रेसियों ने उसे मान्यता भी दी है. बाळासाहब ठाकरे ने भी उनके पुत्र उद्धव ठाकरे को उनकी पार्टी का कार्याध्यक्ष बनाकर उसी परंपरा का पालन किया. इतना ही नहींउद्धव ठाकरे के पुत्र - आदित्य को शिवसेना के युवकों के संगठन के मूर्धन्य स्थान पर बिठाया.

मनसेकी ताकद
इस स्थिति में शिवसेना के भविष्य के बारे में चिंता करने या उस प्रश्‍न पर विचार करने का प्रयोजन होने का कारण ही नहीं होना चाहिए. लेकिन प्रयोजन है. कारणठाकरे परिवार के हीबाळासाहब के सगे भतिजे राज ठाकरे ने बाळासाहब के होते हीउद्धव ठाकरे का नेतृत्व मानने को नकार दिया. बाळासाहब जैसे प्रचंड ताकदवान नेता की इच्छा के सामने गर्दन न झुकाकरउन्होंने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) नाम से नई पार्टी बनाईऔर २००९ में हुए विविध स्तरों के चुनावों में शिवसेना की परवाह किये बिना अपनी शक्ति प्रकट की. महाराष्ट्र राज्य विधानसभा में मनसे के १३ विधायक है. २८८ की विधानसभा में १३ यह लक्षणीय संख्या नहींकोई ऐसा कह सकता है. लेकिन बाळासाहब के राजनीति में सक्रिय रहते मनसे इस संख्या तक पहुँचीयह उल्लेखनीय. उसके बाद हुए नगर पालिका और महानगर पालिका के चुनावों में भी मनसे ने अपनी ताकद दिखाई है. मुंबईठाणेनासिक,औरंगाबाद महापालिकाओं में की मनसे की ताकद को दुर्लक्षित नहीं किया जा सकता. राज ठाकरे ने यह जो करिष्मा कियावैसा प्रकाशसिंह बादल का भतिजा नहीं कर पाया. उनका पूरा नाम मुझे याद नहीं. लेकिन उनके नाम के अंत में मान’ है. मान भी अकाली दल से अलग हुए है. अलग होकर उन्होंने भी चुनाव लड़ालेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. इस कारण वे सांप्रत पंजाब की राजनीति में उपेक्षित है. बाळासाहब ठाकरे के बाद मनसे की ताकद और बढ़ेगी. और मनसे की ताकद बढ़ने का अर्थ है शिवसेना की ताकद घटना.

एकीकरण
क्या शिवसेना और मनसे एक साथ आएगीयह प्रश्‍न पूछा जा सकता है. वह एकदम अप्रस्तुत नहीं. बाळासाहब ठाकरे की अंतिम बिमारी के समयउसी प्रकार उद्धव ठाकरे पर हुई शस्त्रक्रिया के समय राज ठाकरेसारा विरोध भूलकर उनसे भेट करने गये थे. बाळासाहब के अंतिम समय में वे उद्धव ठाकरे के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे. उनकी इस कृति को क्या राजनीति की चाल मानेऐसा प्रश्‍न पूछा जा सकता है. मेरे मतानुसार वह राजनीति की चाल नहीं होनी चाहिएहोगी भी नहीं. लेकिन राज ठाकरे के इस वर्तन सेउनका कद बड़ा हुआ हैयह निश्‍चित. इस प्रकार मन का बड्डपन दिखाने वाले राज ठाकरे उनकी पार्टी शिवसेना में विलीन कर स्व. बाळासाहब की आत्मा को आनंद देगेयह प्रश्‍न अधिक महत्त्व के है. ऐसा एकीकरण हो सकता है. लेकिन वह राज ठाकरे के नेतृत्व में ही होगाउद्धव ठाकरे के नेतृत्व में नहीं. स्वयं उद्धव ठाकरे और मनोहर जोशीरामदास कदमसंजय राऊत जैसे शिवसेना के ज्येष्ठ नेताओं को क्या यह मान्य होगायह महत्त्व का प्रश्‍न है. लेकिन शिवसेना का नाम और प्रतिष्ठा टिकाकर रखनी होगी तो इसके अलावा अन्य कोई मार्ग नहींऐसा मुझे लगता है.

समझौते की संभावना
यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए किउद्धव ठाकरे की तबीयत अपेक्षाकृत सुदृढ नहीं है. दो बार हृदय पर ऍन्जोप्लास्टी’ हुई है. उनकी आयु अधिक नहीं हैलेकिन इस हृदय विकार ने उनकी कार्यशक्ति को निश्‍चित ही बाधित किया होगा. अपने स्वास्थ्य की इस स्थिति मेंउद्धव ठाकरेदुय्यमत्व स्वीकार कर क्या राज ठाकरे के हाथों पार्टी के सूत्र सपूर्द करेगेयह प्रश्‍न हैऔर वह शिवसेना के भविष्य मतलब नाम और प्रभाव से भी जुड़ा है. दोनों पार्टियॉं आज के समान ही अलग-अलग रही और २०१४ के विधानसभा के या लोकसभा के चुनाव में मनसे ने शिवसेना को मात दी तो आश्‍चर्य नहीं. अलग-अलग रहकर भी २०१४ का विधानसभा का चुनाव लड़ा जा सकता है. और दोनों मिलकर सौ के करीब सिटें जीत पाईतो सत्ता के लिए वे एक भी आ सकते है. लेकिन यह सुविधा के लिए किया समझौता हो सकता हैहृदय से एक होना नहीं. इस कारण वह शक्तिसंपन्नता का आलंबन भी नहीं हो सकेगा.

महागठबंधन का भविष्य
बाळासाहब ठाकरे के निधन के बाद निर्माण होने वाली परिस्थिति का परिणाम महाराष्ट्र की संपूर्ण राजनीति पर भी हो सकता है. महाराष्ट्र में शिवसेना,भाजपा और रामदास आठवले की रिपाइं का महागठबंधन है. यह महागठबंधन शक्तिशाली है. नगरपालिका और महानगर पालिका के चुनावों मेंइस महागठबंधन का अपेक्षाकृत प्रभाव दिखाई नहीं दियालेकिन विधानसभा के चुनाव में वह दिखाई दे सकता है. महापालिका के चुनाव बड़े शहरों के संदर्भ में थे. विधानसभा के चुनावों में ग्रामीण क्षेत्र को अधिक महत्त्व होगाइसलिए ही रिपाइं का साथ शिवसेना-भाजपा गठबंधन को उपकारक सिद्ध होगा,इसमें कोई संदेह नहीं. इसमें रिपाइं का भी लाभ है. लेकिन शिवसेना का नेतृत्व राज ठाकरे के पास गयातो क्या रिपाइं गठबंधन के साथ रहेगीयह प्रश्‍न है. गठबंधन में मनसे को समाविष्ट करने के लिए आठवले का विरोध है. कारण उन्हें ही पता होगा. लेकिन विरोध हैयह स्पष्ट है. मनसे को गठबंधन में शामिल करेऐसा भाजपा के शक्तिशाली नेताओं का मत है. अभी तकसंपूर्ण भाजपा ने इस बारे में निश्‍चित अधिकृत भूमिका नहीं ली है. लेकिन वह भूमिका पार्टी को लेनी ही होगी. राज ठाकरे के हाथ ही शिवसेना का नेतृत्व आयातो फिर विचार करने का प्रश्‍न ही नहीं. कारणगठबंधन शिवसेना के साथ है व्यक्ति के साथ नहीं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और मनसे अलग ही रहीतो भाजपा की नीति क्या होगीमनसे की आज की शक्तिऔर बाळासाहब ठाकरे के निधन के बाद उस शक्ति में बहुत बड़ी मात्रा में वृद्धि होने की संभावना ध्यान में लेते हुएभाजपा नेशिवसेना को छोडकरमनसे के साथ गठबंधन करने की संभावना नकारी नहीं जा सकती.

सत्तारूढ गठबंधन में खटपट
भाजपा और मनसे का गठबंधन प्रभावी हो सकता है. कॉंग्रेस और राष्ट्रवादी कॉंग्रेस गठबंधन में चल रही खटपट की पार्श्‍वभूमि पर वह अधिक प्रभावी सिद्ध होगा. कॉंग्रेस और राष्ट्रवादी कॉंग्रेस के बीच आज जो अ-स्वस्थता का वातावरण हैउसका परिणाम २०१४ के लोकसभा के चुनाव पर नहीं भी होगा. वे लोकसभा के चुनाव एक होकर लड़ेंगे. शरद पवार गठबंधन नहीं टूटने देंगे. लेकिन यह एकता लोकसभा के चुनाव के बाद चार-पॉंच माह में होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव में नहीं दिखाई देगी. शायद गठबंधन कायम रहेगा. लेकिन दोनों के प्रयास एक-दूसरे के पॉंव खीचने के ही रहेंगे. अब तक,संख्या कुछ भी होलेकिन मुख्यमंत्री कॉंग्रेस का ही रहेगाइसे राष्ट्रवादी कॉंग्रेस ने मान्यता दी है. किंतु इसके बाद यह संभव होगाऐसे संकेत नहीं दिखाई देते. जिसके विधायक अधिक उसका मुख्यमंत्रीयह समझौते का सूत्र हो सकता है. इस परिस्थिति मेंअपने विधायक अधिक संख्या में चुनकर आएइस सकारात्मक रणनीति के साथ हीदूसरे के विधायकों की संख्या अपने विधायकों की संख्या से कम कैसे रहेगीयह नकारात्मक रणनीति भी कार्यरत रहेगी ही. इस परिस्थिति में मनसे-भाजपा गठबंधन को सत्ता प्राप्त करने का मौका मिल सकेगा. कुछ अघटित होकरशिवसेनामनसे और भाजपा का गठबंधन हुआ और उसमें आठवले की रिपाइं भी शामिल हुईतो २०१४ में इस गठबंधन की सरकार स्थापन होने की संभावना बहुत अधिक है.

भविष्य
यह सब संभावनाए और प्रश्‍न बाळासाहब के निधन के कारण चर्चा में आए है. उनके निश्‍चयात्मक उत्तर दिए जाने की स्थिति आज नहीं. कुछ समय राह देखनी होगीउसके बाद ही इन प्रश्‍नों के उत्तर क्रमश: स्पष्ट होते जाएगे. इन सब संभावनाओं और प्रश्‍नों पर ही शिवसेना का भविष्य निर्भर है. केवलशिवसेना’ इस नाम का ही नहींशिवसेना के नेतृत्व के पदों पर जो लोग आरूढ हैंउनका भी सियासी भविष्य इस पर ही निर्भर होगा. तोकुछ समय राह देखते है.


मा. गो. वैद्य
(अनुवाद : विकास कुलकर्णी)      
                                    babujivaidya@gmail.com

Maneka Gandhi & NCST Chairperson Dr. Rameshwar Oraon met land Loser-Citizen


From the side of RSB Jenadesh Loser-Citizen Forum & 
CESC Mahimagadi Loser-Citizen ForumEr. Hota met Maneka Gandhi
& NCST Chairperson Dr. Rameshwar Oraon at New Delhi.



New Delhi (28/11) – Today, on behalf of the affected villagers of the proposed CESC Power Pvt. Ltd. at Dhenkanal Sub-Division & RSB Metal Tech. Pvt. Ltd. at Kamakhyanagar Sub-Division of Dhenkanal District, a delegation under the leadership of the Great Farmer Leader Er. Debashisha Hota met BJP MP & International Envionment & Wild-Life Protection Leader Smt Maneka Gandhi.
Mrs. Gandhi assured Hota to be involved on the issue for the safe-guard of the Wild-Life, Forest & Environment, Tribal, SC & Poor People.
Yesterday, Hota met National Commission for Scheduled Tribe Chairperson Dr. Rameshwar Oraon. The District Secretary of Anti Corruption Committee Mr. Ranjan Lenka was also present on this occasion.
Dr. Oraon declared to visit the area affected during mid-January & punish the corrupt officials according to the report. The issue was now taken up by the Head-Quarter itself.
Here noteworthy that, In 1971, K-Form Pattas are given to 56 Tribal & SC families of Chhatia. They’ve requested the then collector to issue them permanent Pattas 6 long years back on 7th October 2006 by diary no. 78. They ran number of times from Chhatia village Committee to all related departments for the above matter. But nothing happened. At last they approached Mr. Hota on 23rd January 2012.
Mr. Hota from RTI letter no.111 dated 17th February 2012, came to know that the above mentioned application wasn’t traceable at Dhenkanal Collectorate. Against this, he made an appeal before ADM. The ADM summoned Hota to appear on 16th March 2012 for hearing. On the same day, the ADM ordered the Gondia Tahasildar to furnish the action taken report within 7 days. Once again from RTI letter no.306 dated 9th May 2012, Hota came to know that the lands of K-Form Pattas are donated to the CESC power plant during 2010-11 without giving any compensation to the losers.
                It's now a point of question keeping in view of the Constitution of India, that
Why the District Collector, District Forest Officer(D.F.O.) & District Tribal Welfare Officer(D.W.O.) has not been issued The "Title for Forest Land Under Occupation" to the K-Form Holders according to "The Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Rules, 2007 " followed by the 12.8.2009 Judgment of Honorable High Court of Odisha in W.P.(C) No.4933 of 2008 ?
Hence, the affected TRIBALs demanded a 3-Party-Discussions comprising of CESC Mahimagadi Loser-Citizen Forum with CESC Power Pvt. Ltd. Owner and the Representation from the Government as the Mediator, during their Mega Rally on last 21st May.
But, 3-party discussion involving land-mafia proved the ill-intention of the officials. This has increased tension among the affected TRIBALs.
A Delegation of 40 people have marched to Jantar Mantar on last 6th October & met Leader of Opposition Mrs Sushama Swaraj , NDA convenor Sarad Jadav, Union Tribal Minister Sri V.K.Deo, Congress MP Bhakta Das, Independent MP AV Swamy & NCSC chairperson PL Punia