Saturday, November 12, 2011

चीन-पाक की बढ़ती नजदीकियां



चीन और पाकिस्तान निकटतम मित्र राष्ट्र हैं। उनके हाल के सैनिक अभ्यास से साफ दृष्टिगोचर है कि चीन का पाकिस्तान से निकट का सहयोग है और यह सहयोग भारत के खिलाफ जाता है। भारत ने हालांकि, पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर में चीन की मौजूदगी पर कड़ी आपत्ति जता दी है। भारत ने यह आपत्ति उनके सैनिक युद्धाभ्यास पर नहीं, बल्कि उनकी सैन्य वास्तविकताओं को देखते हुए जताई है। चूंकि अब दो सेनाएं भारत के खिलाफ हैं। 

इन परिस्थितियों में भारत को भी अपना सैनिक अभ्यास करना चाहिए। इस बीच पाकिस्तान और अमेरिका के बीच भी तनाव बढ़ा है। पाकिस्तान अमेरिका को धमका रहा है कि उसके पास अन्य विकल्प भी हैं। इसका सीधा अर्थ चीन से है। चीन इसके लिए तैयार है और खुद को वह पाकिस्तान के कट्टर समर्थक रूप में पेश कराना भी चाहता है। भारत का विश्व में जो स्तर है, वह आर्थिक शक्ति के रूप में जाना जाता है। चीन के लिए भारत खतरा है और वैश्विक प्रतिद्वंद्वी भी। चीन-भारत सम्बन्ध अब तनावपूर्ण हो रहे हैं और एक नाजुक स्तर पर पहुंच चुके हैं। ऎसे में अब भारत को मजबूती की स्थिति में रहते हुए चीन के साथ सीमा विवाद का समाधान तलाशना चाहिए। चीन के रणनीतिकार चीन को घेरे में लेने के अमेरिकी उद्देश्यों के बारे में बड़े चिन्तित हैं। भारत, अमेरिका का शक्तिशाली सहयोगी है। ऎसे में यदि अमेरिका और भारत दोनों आपस में हाथ मिला लेते हैं तो चीन की निर्भयता पर गहरा असर डाल सकते हैं।

भारत तेजी से वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है। भारत की विदेश नीति के उद्देश्यों के साथ महत्वाकांक्षाएं हैं। इसी कारण चीन, पाकिस्तान का समर्थन कर प्रभावशाली तरीके से भारत को कम तीव्रता वाले युद्ध में शामिल कर सकता है। उसकी राजनयिक और सैन्य कोशिशें भारत के खिलाफ होंगी। यही भारत के लिए गहरी चिन्ता का विषय है। चीन हाल के दिनों में पाकिस्तान को खुले समर्थन का पर्याप्त संकेत दे चुका है और आगे भी इन कोशिशों में तेजी ही आएगी। 

हालांकि, पाकिस्तान को वित्तीय सहायता देने में चीन के सामने समस्याएं हैं। चीन और पाकिस्तान के बीच सम्बन्ध ज्यादातर अनिश्चित ही रहेंगे। पाकिस्तान चाहता है कि चीन से उसके सम्बन्ध और मजबूत हों। पाकिस्तान की घरेलू समस्याएं बढ़ रही हैं। चीन खुद को इन समस्याओं में उलझने का अनिच्छुक दिखाई पड़ता है, जब तक कि बहुत जरूरी न हो जाए। हालांकि चीन, पाकिस्तान के ज्यादा निकट है और भारत की भी इसमें कोई रूचि नहीं होगी लेकिन चीन की अमेरिकी घेराबंदी के लिए उसे अमेरिका की मदद करनी चाहिए। चीन को इस बात की चिन्ता है कि उसके मुस्लिम बाहुल्य प्रान्त झिनझियांग में पाकिस्तानी इस्लामिक संगठनों का प्रभाव बढ़ रहा है। इस मामले में चीन ने बहुत ही सावधानीपूर्वक कदम उठाए हंै और कभी-कभी तो कड़ा रूख भी अख्तियार किया है। 
चीन का पाकिस्तान से जुड़ाव अविश्वसनीय रूप से बढ़ रहा है। यह तो तय है कि चीन अपने सभी प्रयासों के बाद भी पाकिस्तान मामले में अमरीका की बराबरी नहीं कर सकता, चाहे वह प्रभाव का मुद्दा हो या आर्थिक सहायता देने का। कोई आश्चर्य नहीं, इस्लामाबाद जब कभी बीजिंग के साथ सम्बन्ध बढ़ाने या क्षेत्र को व्यापक बनाने का इच्छुक दिखता है, चीन वित्तीय समझौतों में खिंचा-खिंचा सा दिखाई पड़ता है लेकिन पाकिस्तान के साथ सैन्य सहयोग से चीन को भारत के खिलाफ रणनीतिक रूप से आगे बढ़ने की और जगह मिलती है। 

इस बीच, चीन की सैन्य गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। एक साल पहले इतनी किसी ने नहीं देखी थीं। इसके विपरीत भारत के सैन्य आधुनिकीकरण का कार्यक्रम बहुत ही धीमी गति से चल रहा है। इस साल भारत ने अपनी जीडीपी का कुल 1.8 प्रतिशत ही रक्षा के लिए आवंटित किया है। जबकि हकीकत यह है कि सेना का खर्च पहले ही 11.58 प्रतिशत तक बढ़ चुका है। हमारी रक्षा तैयारियों या रक्षा जागरूकता का यह दुखद अध्याय है कि हमारी जीडीपी का रक्षा अनुपात दो फीसदी से भी कम है। यह उस समय घटित हो रहा है जब भारत की मंशा रक्षा खरीद पर 112 बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च करने की है। यह खरीद अगले पांच सालों में की जानी है। इसे अब तक की सबसे बड़ी रक्षा खरीद बताया जा रहा है और यह विश्व के एक देश का सबसे बड़ा सरकारी खरीद कार्यक्रम हो सकता है। लेकिन रक्षा खरीद प्रक्रिया भी भ्रष्टाचार की ओर झुकी दिखाई पड़ती है। पिछले बीस सालों में अनेक घोटालों के चलते हमारे सरकारी खरीद कार्यक्रम में देरी हुई है और इसकी कीमत हमारी रक्षा तैयारियों को चुकानी पड़ी है। चीन की रक्षा क्षमताओं में वृद्धि और उसके रक्षा खरीद कार्यक्रम को देखते हुए हम इतनी देरी ज्यादा समय तक बर्दाश्त नहीं कर सकते। रक्षा खरीद में आलस्य या गफलत में रहने से युद्धक सामग्री की कीमतों में इजाफा हो जाएगा और लम्बे समय में इनकी लागत काफी बढ़ जाएगी।

भारत-चीन को अपने हितों के बारे में साझा करना चाहिए, इसमें व्यापारिक हित तो हों, साथ में इस्लामिक कट्टरपंथ के बढ़ने या उसके फैलने से रोकने के निश्चित उपाय भी शामिल हों। चीन, अन्य शक्तियों जैसे रूस के साथ भी अपने हितों का साझा कर सकता है। लेकिन चीन के लिए पाकिस्तान से मित्रता मध्य एशिया के समृद्ध खनिज पदार्थो की सुनिश्चित उपलब्धता हासिल करने के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। उधर, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में जारी अस्थिरता भारत के लिए गम्भीर चुनौती है। हालांकि, चीन ने अतिवादी सुन्नी-वहाबी जैसे संगठन को नेस्तानाबूद करने के लिए पाकिस्तान पर दबाव बनाया है। वास्तव में, इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। 
अफसर करीम
रिटायर्ड मेजर जनरल व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य 
स्त्रोत: http://www.patrika.com/article.aspx?id=२९८२७
..तो सुलझ जाती कश्मीर समस्या
इतिहास कैसे रचा जाता है इसका इतिहास जानने के लिए भारत में "देशी रियासतों का इतिहास" और सरदार वल्लभ भाई पटेल का प्रयास प्रत्यक्ष प्रमाण है। संकल्प, साहस, सूझ-बूझ के धनी पटेल ने तत्कालीन 565 से भी अधिक देशी रियासतों का भारत मे विलीनीकरण करके राष्ट्रीय एकता के सूत्रधार के रूप में इतिहास रच दिया है। भारत को सुदृढ़ बनाना उनका सपना था।

जिसे प्रज्ञा और पुरूषार्थ से उन्होंने साकार कर दिया। राष्ट्रीय एकता के शिल्पी के रूप में समय स्वयं उनके कृतित्व के चंवर डुलाता है और इतिहास उनके व्यक्तित्व को पलकों पर बैठाता है। उनकी प्रकृति में पुरूषार्थ, संस्कार में स्वाभिमान, सोच में सार्थकता और संवाद मे स्पष्टवादिता थी। मंदिर पर कलश की तरह उनका कृतित्व और बर्फ की चट्टान में आग की तलवार की तरह व्यक्तित्व था। सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात में हुआ था। उनके पिता झबेर भाई बोरसद ताल्लुका के करमसद गांव के निवासी थे। वे पेशे से साधारण किसान थे। उनकी माता लाड़बाई तथा पिता ने साहस, सच्चाई और सादगी के संस्कार तो सिखाए ही पुरूषार्थ और पराक्रम का पाठ भी पढ़ाया। प्रारंभ में प्रांतीय किसान नेता के रूप में तथा आगे चल कर देश के दिग्गज और दिलेर नेता के रूप में वे अपने फौलादी व्यक्तित्व के कारण लौह पुरूष कहलाए। 

15 दिसंबर 1950 को उनका स्वर्गवास हो गया। सरदार पटेल असत्य के आलोचक और सत्य के समर्थक थे। कितना ही शक्तिशाली व्यक्तित्व क्यों न हो अगर वह अहंकारी व अन्यायी होता तो उसे मुंह पर फटकारने का पटेल में गजब का नैतिक साहस था, लेकिन स्वयं से गलती होने पर स्वीकारने की अद्भुत गुण भी उनमें था। उदाहरण के लिए गुजरात क्लब के आमंत्रण पर जब महात्मा गांधी व्याख्यान देने आए तो पटेल ने गांधी जी की उपेक्षा करते हुए कहा "मुझे इन चंद पढ़े-लिखे राष्ट्रवादियों से सख्त नफरत है। 

ये लोग अंजीनिर्वासी करके परम शक्तिशाली ब्रिटिश शासन को यहां से उखाड़ फेंकेगे मुझे इसमें बहुत संदेह है।" लेकिन कालांतर में चंपारण जिले में गांधी-प्रणति सत्याग्रह की सफलता देखकर सरदार पटेल चकित, चमत्कृत और अभिभूत हो गए थे। तब से वे गांधी जी कीआंदोलन पद्धति के प्रशंसक और भक्त बन गए थे। यही कारण था कि उन्होंने सत्याग्रह के महात्मा गांधी के दर्शन को क्रांतिकारी निरूपित किया। उन्होंने खुद सत्याग्रह के कई प्रयोग करके अन्याय व आतंक को ध्वस्त किया। गांधी जी के साथ उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। जिससे उनकी संघर्ष शक्ति और बढ़ गई। नागपुर का झंडा सत्याग्रह, बारडोली का ताल्लुका सत्याग्रह, उनकी ख्याति मे चार चांद लगा गया।

वे टे्रड यूनियन संबंधी सुधारों और आंदोलनों के भी प्रेरणा पुंज थे। जब भारत आजाद हुआ तो जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व मे उन्हें गृह विभाग के साथ-साथ देशी रियासतों का विभाग भी दिया गया। पटेल ने विवेक और पुरूषार्थो का प्रयोग करके देशी रियासतों का भारत में विलीनीकरण करके भारत को एकता के सूत्र में पिरोया। यह उनकी दूरदृष्टि और व्यूह रचना का परिणाम था कि जूनागढ़ और हैदराबाद रियासतों का विलय उन्होंने भारत में कराया। हैदराबाद विलय टेढ़ी खीर था, लेकिन पटेल ने अपने अदम्य साहस से वह कर दिखाया। 

शेख अब्दुला के प्रभाव में आकर नेहरू जी ने कश्मीर मामले को पटेल के रियासत विभाग से अलग कर दिया। बतौर प्रधानमंत्री नेहरू जी ने कश्मीर को विशेष्ा राज्य के रूप में अपने हाथ में ले लिया था। बाद में कश्मीर के मामले को नेहरू जी संयुक्त राष्ट्र में लेकर गए तब से ही कश्मीर की समस्या सुरसा की तरह बढ़ती जा रही है। पटेल की एक शक्तिशाली सैनिक कार्रवाई कश्मीर समस्या को सदा के लिए सरलता से सुलझा सकती थी। पटेल ने बड़े दुख से कहा था कि "जवाहरलाल और गोपालस्वामी अयंगर ने कश्मीर को व्यक्तिगत विष्ाय बनाकर मेरे गृह विभाग तथा रियासत विभाग से अलग न किया होता तो कश्मीर समस्या उसी प्रकार हल होती जैसे हैदराबाद की।"

अजहर हाशमी
भारतीय सांस्कृतिक चेतना के जाने माने व सम्मानित विद्वान व प्रोफेसर
स्त्रोत: http://www.patrika.com/article.aspx?id=२९७०२

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