Friday, August 17, 2012

असम में हिंसाचार : एक स्थायी उपाय


असम के कोक्राझार जिले में फूटा हिंसाचार अब रूका है. अब’ यह शब्द महत्त्व का है. वह फिर कब फूट पड़ेगा इसका भरोसा नहीं. दोनों पक्ष के लाखों लोग निर्वासित शिविरों में रह रहें हैं. कई गांव बेचिराख हुए हैं.
अंतर
इस हिंसाचार में एक पक्ष बोडो’ जनजाति का हैतो दूसरा पक्ष बांगला देश में से अवैध रूप से भारत में घुसे मुस्लिम घुसपैंठियों का है. हिंसाचार कितना भीषण होगाइसका अंदाजप्रथम प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और फिर तुरंत गृहमंत्री (अर्थात् पहले के) पी. चिदंबरम् ने इस हिंसाचारग्रस्त भाग को दी भेट से लगाया जा सकता है. और यह भी अंदाज लगाया जा सकता है किइस हिंसाचार मेंजीवित एवं वित्त हानि मुसलमानोंकी अधिक हुई होगी. बोडों की अधिक हानि हुई होतीऔर मुसलमान का पक्ष मजबूत होतातो प्रधानमंत्री और गृहमंत्री निश्‍चित ही वहॉं दौडकर नहीं जाते. १९८९ में कश्मीर की घाटी में से तीन-चार लाख हिंदू पंडितों को निर्वासित होना पड़ा था. इन पंडितों पर अत्याचार कर उन्हें पलायन करने के लिए बाध्य करने में स्थानिक मुस्लिमों का ही हाथ थायह बताने की आवश्यकता नहीं. गया कोई प्रधानमंत्री उन निर्वासित पंडितों के आँसू पोछनेया तत्कालीन गृहमंत्री ने हमलावरों को नियंत्रित करने के लिए उठाए कठोर कदमनहीं. उस समय विश्‍वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री और मुफ्ति महमद सईद गृहमंत्री थे. उनकी सत्ता अधिक समय तक नहीं टिकीयह सच है. १९९१ में पी. व्ही. नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने. उन्होंने निर्वासित पंडितों का हाल-चाल पूछावे तो पूरे पॉंच वर्ष प्रधानमंत्री थे. लेकिन उन्होंने अपने कार्यकाल में पंडितों के स्वगृह में पुनवर्सन के लिए कुछ नहीं कियाइतना ही नहींनिर्वासितों को दिलासा देने के लिए उनकी छावनियों को भेट देने का भी कष्ट नहीं किया. कारणइस मामले में अन्यायग्रस्त और अत्याचार पीडित हिंदू थे. वे मुसलमान होते तो इन लोगों का आचरण अलग होता. और वह स्वाभाविक ही कहा जाना चाहिए. कारणमुसलमानों की जैसी मजबूत व्होट बँक हैवैसी हिंदूओं की नहीं. हिंदू अनेक गुटों में विभक्त है.
क्रिया-प्रतिक्रिया
तात्पर्य यह किकोक्राझार जिले में और समीपवर्ती क्षेत्र में भी मुसलमानों की जीवित और वित्त हानि अधिक हुई. लेकिन मुसलमानों को यह प्रतिक्रिया के स्वरूप भोगना पड़ा है. हिंसक क्रिया उनकी ओर से प्रथम हुई और फिर बोडो जनजाति की आरे से उसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई. हमारे देश में एक विचित्र सेक्युलर मानसिकता बनी है. यह मानसिकता मूलत: कारणीभूत हुई क्रिया को भूल जाती है और प्रतिक्रिया पर ही आलोचना के कोडे बरसाती है. बहुचर्चित गोध्रा का ही उदाहरण ले. पहले कृति मुसलमानों की ओर से हुई. ५७ हिंदू कारसेवकों को रेल के डिब्बे में बंद करउन्हें जिंदा जलाकर मौत के घाट उतारा गया. इसकी अकल्पित तीव्र प्रतिक्रिया गुजरात के अन्य भागों में हुई. गुजराती आदमी सौम्य प्रकृति के होते हैंऐसी उनकी देशभर में प्रतिमा है. लेकिन वे भी गोध्रा के अमानुष अत्याचार से भडक उठे. और सही-गलत का विवेक गवॉंकर उन्होंने उस अत्याचार का बदला लिया. मुझे नहीं लगता किकोई भी सरकार या कोई भी राजनीतिक नेता तुरंत संपूर्ण राज्य की जनता को भडका सकता है. जनता ही भडकी. अब प्रकरण न्यायप्रविष्ठ है. अपराधियों को सजा सुनाई जा रही है. उसके समाचार भी प्रमुखता से प्रकाशित एवं प्रसारित किए जा रहे हैं. लेकिन उन ५७ निरपराध कारसेवकों कोजिन्होंने रेल रोककर जिंदा जलायाउनके विरुद्ध के मुकद्दमें का समाचार क्या हमनेसुना हैनिश्‍चित ही उस कृत्य में के अपराधियों पर मुकद्दमें चलें होंगे. उनके मुकद्दमें के फैसले का समाचार क्यों नहीं फैलतावे अपराधी मुसलमान है इसलिएप्रसारमाध्यमों ने ही इसका उत्तर देना चाहिए.
घूसखोरी
यह कुछ विषयांतर हुआ. हमारा आज का विषय है कोक्राझार में का हिंसाचार. बोडो क्यों इतने भडकेवैसे वे पहले भी भडके थे. लेकिन मुसलमानों पर नहीं. असम की सरकार पर. वे उनकी बहुसंख्या का क्षेत्र असम से अलग चाहते थे. इसके लिए उनकी एक संस्था भी स्थापन हुई थी. बोडो लिबरेशन टायगर्स’ ऐसा उस संस्था का नाम है. लेकिन समझौते से वह प्रश्‍न हल किया गया. २००३ में वह समझौता हुआ. इस समझौते के अनुसार बोडो टेरिटोरियल कौन्सिल’ (बोटेकौ) की स्थापना की गई और उसे कुछ विशेष अधिकार भी दिए गए.बोटेकौ’ में स्वाभाविक ही बोडों का वर्चस्व रहेगा. लेकिन यह वर्चस्वइस प्रदेश में के मुसलमानों को सहन नहीं होता. इस बोडोलॅण्ड के प्रदेश में कुछ स्थानीय मुसलमान भी हैं. उनमें और बोडो में झगडा नहीं. नहीं थाऐसा कहना शायद अधिक योग्य होगा. लेकिन वहॉं बांगला देश में के मुसलमान बड़ी संख्या में घुसपैंठ कर घुसे है. इन घुसपैंठियों ने वहॉं का वातावरण बिगाडा है.
सत्ता-लालची
इन मुस्लिम घुसपैंठियों ने करीब ३५ प्रतिशत सरकारी खास’ भूमि पर अतिक्रमण किया है. सरकार उस बारे में कुछ भी नहीं करती. असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का एक निर्लज्ज विधान अनेकों को स्मरण होगा ही. गोगोई ने कहा था किअसम में कोई भी अवैध घुसपैंठी नहीं. सब असम में के ही है. गोगोई से पूछना चाहिए किअसम के २७ जिलों में के ११ जिलें मुस्लिमबहुल कैसे बनेक्या वे १५ ऑगस्ट १९४७ को ही मुस्लिमबहुल थेपुराने असम का एक सिल्हट जिला मुस्लिमबहुल होने का संदेह था. वहॉं जनमत संग्रहकराया गयाऔर बहुमत पाकिस्तान के पक्ष में हुआ. वह जिला पाकिस्तान में – उस समय के पूर्व पाकिस्तान में मतलब आज के बांगला देश में – समाविष्ट किया गया. और कोई भी जिला यदि मुस्लिमबहुल होतातो पाकिस्तानी नेतृत्व उसे भारत में रहने देतागोगोई ने उत्तर देना चाहिए किबांगला देश की सीमा से सटे यह ११ जिले मुस्लिमबहुल कैसे बनेलेकिन वे उत्तर नहीं देंगे. अल्पसंख्य मुस्लिमों के व्होटबँक पर उनकी सत्तानिर्भर है. और ये लोग इतने स्वार्थी और सत्ता लालची है किसत्ता के लिए देश-हित को आग लगाने से भी नहीं हिचकेंगे.
चिनगारी
वहॉं समस्या बांगलाभाषी घुसपैंठियों की है. उनकी शिकायत है कि, ‘बोटेकौ’ पर उनका वर्चस्व नहीं है. यह तो होगा ही. जिन घुसपैंठियों का सात्म्य (assimilation) हुआ हैउन्हें नागरिकता के अधिकार हैं ही. लेकिन इतने से वे समाधानी नहीं. यह झगडे की जड़ है. और २००८ से इस झगडे ने गंभीर स्वरूप धारण किया है. अर्थात् आक्रमण मुसलमानों की ओर से ही प्रारंभ हुआ है. ऑल बोडो स्टुडंट्स युनियन’ के भूतपूर्व अध्यक्ष और राज्य सभा के भूतपूर्व सांसद यु. जी. ब्रह्म बताते है किगत दो वर्षों में दो सौ बोडो की हत्या हुई है. गोगोई साहब,आप ही बताए यह कत्तल किसने कीक्या बोडो ने ही बोडो की हत्या कीया बोडोबहुल प्रदेश में जो बिल्कुल थोडी जनजाति के लोग हैंउन्होंने बोडो की हत्या कीउत्तर साफ है. धाक जमाने के लिए मुसलमानों ने ही उनकी हत्या की. गत जुलाई माह के अंत में जो हिंसाचार हुआउसकी जड़ भी मुसलमानों के आक्रमक स्वभाव में है. घटना २० जुलाई की है. प्रदीप बोडो और उनके तीन मित्र कोक्राझार में से नरबाडी इस मुस्लिमबहुल भाग से जा रहें थे. बोडो और मुस्लिम घूसपैंठियों में तनाव था ही. इसलिए प्रदीप की पत्नी के उन्हें चेतावनी दी किवहॉं से न जाए. लेकिन प्रदीप ने उसकी बात नहीं मानी. रात ८.३० को समाचार आया कि प्रदीप और उनके तीन मित्रों की हत्या की गई है. पहले उन पर हमला किया गया. तुरंत पुलीस आई.पुलीस इन चारों को ले जा रही थी. तब मुसलमानों के जमाव ने पुलीस की गाडी रोकीउन चारों को बाहर निकाल और उन पर कुल्हाडी से वार कर उनकी हत्या की.
बदले की प्रतिक्रिया
संपूर्ण कोक्राझार जिले के साथ समीपवर्ती क्षेत्र में भी इसकी प्रतिक्रिया हुई. पहले तो मुसलमानों को लगा की यह उनके लिए एक अवसर है और उन्होंने बोडो की बस्तियों पर आक्रमण कर बोडो के अनेक घर जला डाले. कुछ बोडो ने प्रतिकार कियातो उनकी हत्या कर दी गई. फिर बोडो ने पलटकर हमला किया. गोसाईगॉंव में बोडो निर्वासितों का एक शिबिर है. उसमें फिलहाल ३४१९ निर्वासित रहते हैं. इस शिबिर का प्रमुख रूपक बसुमतराय बताता है किजब हमने हमारे ही पड़ोसियों को हमारे घर जलाते देखातब हमने भी बदला लेने का निश्‍चय किया और हमारे लोगों ने भी मुस्लिम बस्तियों पर हमले शुरू किए. उनके घर जलाए. इस प्रतिक्रिया के कारण मरनेवालों में और निर्वासितों में मुसलमानों की संख्या अधिक है. इस कारण कॉंग्रेस की सरकार में हलचल हुई और प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री के दौरे के बाद पुलीस ने और उनकी सहायता के लिए गई सुरक्षा टुकडियों ने हिंसाचार रोका. फिलहाल वहॉं तनावपूर्ण शांति है. लेकिन अब बोडो कहते है किमुसलमानों को हमारे पडोसी स्वीकार करने की हमारे मन की तैयारी नहीं. इन पडोसियों ने ही हमारे घर जलाए हैं.
कुछ समय बाद यह क्षुब्ध भावनाएँ शांत होगी. प्रतिकार का आघात इतना जबरदस्त होगा इसकी कल्पना भी मुसलमानों ने नहीं की होगी. वे भी सही तरीके से रहेंगे. बोटेकौमें बोडो का ही वर्चस्व रहेगा यह भी वे मान्य करेंगे और कम से कम कोक्राझार और समीपवर्ती क्षेत्र में फिर शांतता स्थापित होगी. हर कोई यही चाहेगा.
खतरा
लेकिन मूल घूसपैंठ का प्रश्‍न वैसे ही रहेगा. इन घुसपैंठियों की संख्या भी बढ़ रही है और संख्या के साथ उनकी हिंमत भी बढ़ रही है. असम में उन्होंने ने अपनी एक अलग राजनीतिक पार्टी भी बनाई है. युनायटेड डेमोक्रॅटिक फ्रंट’ ऐसा उसका निरुपद्रवी नाम है. लेकिन वह केवल मुस्लिमों की पार्टी है. आज असम की विधानसभा मेंसत्ताधारी कॉंग्रेस के बाद इसी पार्टी के सदस्यों की संख्या आती है. भाजपा तीसरे क्रमांक पर है. यह घुसपैंठ ऐसे ही चलती रही (वह कॉंग्रेस पार्टी के व्होट बँक की खुशामद की राजनीति से निश्‍चित ही बढ़ेंगी) तो कल उनकी सत्ता भी स्थापन हो सकती है.
स्थायी उपाय
इस पर एक स्थायी उपाय है. ये घुसपैंठी बांगला देश में से आते है. कारण वहॉं भूमि कम और जनसंख्या अधिक है. १९४७ में निर्मित संपूर्ण पाकिस्तान मेंपूर्व पाकिस्तान मतलब आज के बांगला देश की जनसंख्या अधिक थी. लेकिन संपूर्ण पाकिस्तान के सत्ता-सूत्र पूर्व के पास न जायइसलिए पूर्व भाग के लोकप्रिय नेता मुजीबुर रहेमान को पाकिस्तान की सेना की सरकार ने जेल में डाला था और इसी बात पर पूर्व पाकिस्तानविरुद्ध पश्‍चिम पाकिस्तान ऐसा रक्तरंजित संघर्ष हुआ. इस संघर्ष मेंभारत पूर्व पाकिस्तान के समर्थन में खड़ा हुआ और पूर्व पाकिस्तान स्वतंत्र हुआ. वहीं आज का बांगला देश है. आज बांगला देश की जनसंख्या १५ करोड़तो पश्‍चिम पाकिस्तान की १७ करोड़ है. बांगला देश की जनसंख्या कम क्यों हुईकारण वे भारत में घुसपैंठ करते हैं. बांगला देश का क्षेत्रफल करीब देड लाख चौरस किलोमीटर हैतो पाकिस्तान का करीब ८ लाख चौरस किलोमीटर. बांगला देश की भूमि पर जनसंख्या का दबाव है. इस कारणवहॉं के लोग भारत में घुसपैंठ करते है. इसका स्थायी उपाय यह है किबांगला देश भारत में विलीन हो जाए. जिस भाषा के मुद्दे पर उनका पश्‍चिम पाकिस्तान के साथ संघर्ष हुआउस भाषा को भारत में निश्‍चित ही सम्मान मिलेगा. कारण भारत में के पश्‍चिम बंगाल की भाषा बंगाली ही है. मुसलमानों की संख्या अधिक होने के कारणवहॉं का मुख्यमंत्री स्वाभाविक मुसलमान ही रहेगा. मतलब शासन उनका ही रहेगा. भारत में विलीनीकरण होने के बाद अवैध घुसपैंठ का प्रश्‍न ही नहीं शेष रहेगा. वे खुलकर कहीं भी रह सकेंगे. भारत पंथनिरपेक्ष हैइस कारण उन्हें उनके धर्म-मतानुसार आचरण करने की स्वतंत्रता का कायम भरोसा रहेगा. सुरक्षा के खर्च में कमी होकर वह पैसा विकास के काम के लिए खर्च किया जा सकेगा. और भारत की पूर्व सीमा भी सुरक्षित हो जाएगी. ऐसे लाभ ही लाभ है. बांगला देश में आज जनतंत्र है. वहॉं की जनता इस विकल्प का गंभीरता से विचार करें,ऐसा लगता है.

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